मूकता की जंजींरें तोड़ जो कुछ समय पूर्व मै मुखरता की सीढ़ी चढ़ने लगा। बुनने लगा स्वप्न सजीले जो बंद थे ह्रदय के किसी कोने में इन सपनों की तस्वीर लिए सजाने कोई नया आशियाना अपनी ही मस्ती में चलता रहा नयी उमंग लिए। माना कि मेरे सामने मंजिल का हसीन मंजर था लेकिन सफर में अभी जगह-जगह बहुत बंजर था चेहर पर थी मुस्कान अमिट लेकिन चुनौतियों का खंजर था इकतरफा बढ़ने लगा लगाव अपनी ख्वाहिशों का लेकिन सशक्त हुआ प्रभाव समय की साजिशो का प्रतिकूलता की रस्साकशी मुझे खींचने लगी अपनी ओर छूटने लगी मेरी बंद मुट्ठी से मेरे सजीले सपनों की डोर घर करने लगा डर अब ह्रदय के उस कोने में जहाँ से निकाली थी मैने सपनों की तस्वीर लेकर चला था उसे मनचाहे रंगों से भरने अपनी मूकता को जो मैने अभी मुखर किया था क्या समय की विमुखता में बँध जायेंगे म...
" नायक के भेद" संस्कृत साहित्य में दस रूपक माने गये है धनञ्जय ने अपने दशरूपकम् में रूपक के दस भेद माने है नाटक,प्रकरण,भाण,व्यायोग समवकार,डिम ईहामृगअंक, वीथी,प्रहसन ये रूपक के दस भेद है। रूपक के 10 प्रकारो में प्रत्येक की अपनी विशिष्टता है। जिसका करण कथानक (वस्तु), नायक (नेता), रस में भिन्नता है नाट्यशास्त्रीय दृष्टि से ये तीनों रूपकों के महत्त्वपूर्ण तत्व है। इस Post में हम नाट्यशास्त्र के महत्त्वपूर्ण तत्व नेता अथवा नायक की कोटि (प्रकार) के बारे में जानेंगे। नेता अथवा नायक किसे कहते है सभी रूपकों का एक नायक होता है जिसे अंत में धर्म, अर्थ,कामरूपी फलों में से कोई न कोई फल अवश्य मिलता है। फल ...

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