बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

कविता-उडान#poem#motivational

 अगर खुले आसमां में उडने को है बेकरार

फिर उडने को कर हौसलो के पंखो को तैयार

रंग बिरंगे खगो की उडान को निहार तू

समाज की जंजीरो से मुक्त होकर भर दिल से गहरी (ऊँची)उडान तू

जीवन को बना ले एक खुला आसमान

 इंद्रधनुषी होगी देख फिर तेरी देख शान


उडान


हे कृष्ण.....मुझे अर्जुन बना दीजिए


सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

संस्कृत साहित्य के महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर(rpsc collage lecturer#net#set

 1.विश्वनाथ के मत में काव्य की सिद्धि किस से होती है?

-रस से

विश्वनाथ के अनुसार "वाक्यं रसात्मकं काव्यम्" अर्थात रसात्मक वाक्य ही काव्य है।


2.विश्वनाथ ने किन किन के काव्य लक्षणों का खंडन किया?

-मम्मट,कुन्तक,भोज,आनन्दवर्धन,वामन


3.काव्यलक्षणो का खंडण करते हुए आचार्य विश्वनाथ "स्ववचनविरोधाद् अपास्तम्" यह किसके संबंध में कहते है?

--आनन्दवर्धन 

4आनन्दवर्धन ने काव्य का महत्त्वपूर्ण तत्त्व किसे

 माना है?

-ध्वनि को


5.योग्यताकांक्षासत्तियुक्तः पदोच्चय क्या कहलाता है?

-वाक्य

योग्यता, आकांक्षा और आसक्ति से युक्त पद ही वाक्य है। 

6. साहित्य दर्पण में काव्य प्रयोजन बताया गया है?

-चतुर्वर्गफलप्राप्ति

7.अद्भुत रस मे कौनसा स्थायी भाव है?

-विस्मय

8."अवस्थानुकृतिर्नाट्यम्" नाटय का यह लक्षण किसने दिया है?

- धनञ्जय ने

धनञ्जय ने अपने काव्यशास्त्रीय ग्रंथ"दशरूपक"में नाटक का लक्षण इस प्रकार किया है

" अवस्थानुकृतिर्नाट्यम्

रूपं दृश्यतयोच्यते।

रूपकं तत्समारोपात्

दशधैव रसाश्रयम्।।


9.नमस्तस्मै गणेशाय

यत्कण्ठःपुष्करायते।

यदाभोगघन ध्वनो

नीलकण्ठस्य ताण्डवे।।

यह मंगलाचारण किस ग्रंथ मे और किसने किया है?

-दशरूपक में आचार्य धनन्जय ने

यह नमस्कारात्मक मंगलाचारण है जिसमे आचार्य धनञ्जय ने श्री गणेशजी की स्तुति की है।

  

10.अर्थोपेक्षक के कितने भेद है?

-पाँच

१.विष्कम्भक

२ प्रवेशक

३चूलिका

४अंकान्त

५अंकावतार


11.दशरूपककार के अनुसार स्थायीभाव कितने है?

-आठ

रति =श्रृंगार रस में, हास=हास्य रस में

 शोक =करुण रस में, क्रोध=रौद्र रस में

 भय=भयानक रस में, उत्साह=वीर रस में

विस्मय=अद्भुत रस में,जुगुप्सा=वीभत्स रस में

 ये आठ स्थायी भाव माने गये है।

 

12.सात्वती वृति किस रस में होती है?

-वीर रस में

13.वृतियाँ कितन मानी गयी है?

-4

१कैशिकी  २सात्वती, ३आरभटी ,४भारती


14.कैशिकी वृति किस रस में होती है?

श्रृंगार रस में

  कैशिकी वृति=श्रृंगार रस में

सात्वती वृति=वीर रस में

आरभटी=रौद्र और वीभत्स रस में

भारती वृति=सभी रसों में

15.रूपक के दस भेदों मे एकल अभिनय किसमे होता है?

-भाण में

भाण मे धूर्तचरित्र का वर्णन होता है?

-१अंक होता है।

नायक विट होता है।

कथावस्तु कवि कल्पित होती है।

 भारती वृति पायी जाती है।


16.मालतीमाधव का नायक किस कोटि का नायक है?

-धीरप्रशान्त

नागानन्द का नायक जीमूतवाहन, मृच्छकटिकम् का नायक चारुदत्त भी धीरप्रशान्त नायक है।


17.धूर्तसमागम रूपकों के दस भेदों में से कौनसा है?

-भाण(१अंक)


18.वीथी क्या है?

-रूपक


कर्पूरमञ्जरी उपरूपको में से कौनसा है?

-सट्टक

सट्टक जवनिकाओं में विभाजित होता है।


19.कर्पूरमञ्जरी के लेखक है?

-राजशेखर


 20.दशरूपककार के अनुसार सन्ध्यंगो के कितने प्रयोजन है?

-छः

इष्टस्यार्थस्य रचना गोप्यगुप्ति प्रकाशनम्।

रागःप्रयोगस्याश्चर्यं वृतान्तस्यानुपक्षय:।।

तर्कभाषा#केशवमिश्र#न्याय दर्शन के महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

संस्कृतसाहित्य के महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर


धन्यवाद



सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

तर्कभाषा#षड्विध सन्निकर्ष#न्याय दर्शन

प्रश्न१ प्रत्यक्ष प्रमाण किसे कहते है?

"तत्र प्रत्यक्षज्ञानकरणं प्रत्यक्षम्" प्रत्यक्ष ज्ञान या प्रमा का जो असाधारण कारण है वह ही प्रत्यक्ष प्रमाण है।

प्रश्न२ अब प्रश्न उठता है कि प्रत्यक्ष प्रमा क्या है?

"इन्द्रियार्थ सन्निकर्षजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षम्" अपने विषय के साथ इन्द्रियों का सामीप्य संबंध होने पर उससे जो ज्ञान उत्पन्न होता है।वह प्रत्यक्ष कहलाता है।

प्रत्यक्ष प्रमा के दो भेद है-

निर्विकल्पक ज्ञान

सविकल्पक ज्ञान

प्रत्यक्ष ज्ञान(प्रमा) का कारण इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष( इन्द्रियो का अपने विषयो से संयोग अर्थात समीपता) है।

प्रश्न३  इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष कितने प्रकार का है?

इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष के छः भेद है

1.संयोग सन्निकर्ष= जब इन्द्रिय का किसी वस्तु से संयोग होता है तो उसे संयोग सन्निकर्ष होता है।जैसे आँख द्वारा घडे़ को देखना

2.संयुक्त समवाय=जब आँख द्वारा घडे़ का ज्ञान होता है उसके पश्चात उसमे शुक्ल,रक्त,पीत जैसे रंग का भी ज्ञान होता है तो वहाँ संयुक्त समवाय होता है।

संयुक्त समवाय में वस्तु के गुणो का प्रत्यक्ष होता है।

3.संयुक्त समवेत समवाय- जब वस्तु  से संयोग होने पर उसकी जाति का बोध होता है तो वहाँ संयुक्त समवाय होता है। जैसै घडे़ में शुक्लत्व,लालत्व,पीतत्व का बोध होना।

4.समवाय =श्रोत्रेन्द्रिय(कान) से शब्द का ज्ञान 

5.समवेत समवाय=श्रोत्रेन्द्रिय(कान) से शब्द की जाति शब्दत्व का बोध होना

6.विशेषण-विशेष्य= किसी भूतल पर घडे़ का अभाव होना विशेषण-विशेष्य भाव सन्निकर्ष है। यहाँ" घडे़ का अभाव" विशेषण है  " भूतल "विशेष है।


निष्कर्ष= उक्त षड्विध(छः प्रकार)का सन्निकर्ष प्रत्यक्ष प्रमा के आधार है।

यथार्थ अनुभव और अयथार्थ अनुभव

तर्कभाषा #केशवमिश्र#तर्क भाषा के महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर


शनिवार, 30 जनवरी 2021

तर्कभाषा#केशवमिश्र की तर्कभाषा#न्याय दर्शन#अनुभव के भेद

 अनुभव= स्मृति से भिन्न ज्ञान अनुभव कहलाता है।

 स्मृति भावना पर आधारित होती है जबकि अनुभव नामक ज्ञान स्मरण से भिन्न होता है किसी वस्तु को देखकर होने वाला मानसिक व्यापार बुद्धि का विषय होने पर अनुभव कहलाता है ।

अनुभव के दो भेद है 

यथार्थ अनुभव और  अयथार्थ अनुभव


यथार्थानुभव = जो वस्तु जैसी है उसका वैसा ही ज्ञान प्राप्त होना "यथार्थ अनुभव" कहलाता है। जैसेचांदी को देखकर चांदी का ज्ञान प्राप्त होना।


 यथार्थ अनुभव के चार उपभेद है। 

1.प्रत्यक्ष, 2.अनुमिति 3.उपमिति 4.शाब्द

 इन चारों के आधार पर प्रमाण भी चार माने गए हैं 1.प्रत्यक्ष प्रमाण 2अनुमान प्रमाण3. उपमान प्रमाण 4. शब्द प्रमाण 


आइए हम यथार्थ अनुभव के चारों उपभेदों के बारे में जान लेते हैं

 प्रत्यक्ष यथार्थ अनुभव= प्रत्येक इंद्रिय का उसके विषय से साक्षात् संबंध होने पर जो ज्ञान प्राप्त होता है वह यथार्थ अनुभव प्रत्यक्ष कहलाता है जैसे घड़े को आंख से देखने पर यह घड़ा है इस प्रकार का ज्ञान होना प्रत्यक्ष यथार्थ अनुभव है। 

अनुमति यथार्थ अनुभव= अनु अर्थात बाद में अर्थातप्रत्यक्ष ज्ञान के पश्चात होने वाला ज्ञान। प्रत्यक्षसे भिन्न कारण को देखकर कार्य का अथवा कार्य को देखकर कारण का अनुमान कर लेना अनुमति यथार्थ अनुभव है।  जैसे सुबह उठने पर चारों ओर पानी देखने पर रात्रि में वर्षा होने का अनुमान यही 'अनुमिति" है

 उपमिति यथार्थ अनुभव= किसी वस्तु या व्यक्ति का किसी दूसरे वस्तु या व्यक्ति से कुछ समानता होने पर किसी नवीन वस्तु का ज्ञान होना "उपमिति" नामक यथार्थ अनुभव कहलाता है।

जैसे गो के समान गवय होता है  किसी व्यक्ति के कहने पर जब कोई गवय(नील गाय) से अपरिचित व्यक्ति  गो(गाय)से समानता रखने वाले  किसी किसी पशु को देखता है तो उसे अच्छा यही गवय (नील गाय)है इस प्रकार का नवीन ज्ञान प्राप्त होता है। यही"उपमिति" है

शब्द यथार्थअनुभव=  शब्द से प्रतीत यथार्थ ज्ञान "शाब्द" नामक यथार्थ अनुभव कहलाता है


आगे अयथार्थ अनुभव और उसके उपभेदों के बारे में जानते हैं।

 अयथार्थ अनुभव  जो वस्तु जैसी नहीं है फिर भी उसका वैसे ही रूप में मानना समझना अर्थात वास्तविकता से भिन्नअवास्तविक ज्ञान"अयथार्थ अनुभव" कहलाता है 

अयथार्थ अनुभव तीन प्रकार का होता है।

संशय, विपर्ययऔर तर्क


संशय =किसी एक वस्तु में परस्पर विरुद्ध अनेक धर्मों के संबंध का ज्ञान 

  जैसे किसी सूखे ठूंठ वृक्ष को देखकर यह ठूँठ है या मनुष्य इस प्रकार का संशय युक्त ज्ञान प्राप्त होता है।

 विपर्यय= वास्तविकता से रहित है अवास्तविक  मिथ्या ज्ञान अर्थात जो जैसा नहीं है उसका भी वैसा ज्ञान होना ।

 जैसे सर्प को रस्सी समझ लेना।

तर्क=व्याप्य के आरोप से व्यापक का आरोप करना

जैसे यदि पर्वत में आग न हो तो धुआँ भी नहीं होगा इसमे अग्नि के अभाव रूप व्याप्य आरोप (मिथ्याज्ञान) से धूम अभाव रूप व्यापक का आरोप (मिथ्याज्ञान)है। 


संक्षेप में इस प्रकार अनुभव के दो भेद है

 यथार्थ अनुभव और यथार्थ अनुभव 

 यथार्थ अनुभव के पुनः चार भेद है

 प्रत्यक्ष, अनुमति उपमिति और शाब्द

अयथार्थ अनुभव के पुनः तीन भेद है

 संशय,विपर्यय और तर्क


धन्यवाद दोस्तों, उम्मीद है कि आप सभी का सहयोग आगे भी मिलता रहेगा।

तर्कभाषा के महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

संस्कृत साहित्य के 50 महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर


  

तर्कभाषाTarkbhasha केशवमिश्र#न्यायदर्शन

1. सांख्यतत्वकौमदी कस्य रचनाऽस्ति?

-वाचस्पति मिश्रस्य

2.तर्ककौमुद्या रचनाकार:?

-लौगाक्षिभास्करः

3.न्यायसूत्रषु कस्य खण्डनं क्रियते?

-शून्यवादस्य

4.न्यायः ईश्वरं कथितवान?

-परमात्मा

5.गौतमस्य अपरनामः?

-अक्षपादः

6.तर्कभाषाया:रचयिता कः?

-केशवमिश्रः

7.ज्ञातविषयं ज्ञानं.....?

-स्मृतिः

8.संस्कारमात्रजन्यं ज्ञानं काः?

-स्मृतिः

9.स्मृतिव्यतिरिक्तं ज्ञानं किम्?

-अनुभवः 

10.किम् अनुमानं?

-लिड्गपरामर्शोऽनुमानम्

11अनुमानं कतिविधम्?

-द्विविधम(स्वार्थानुमानं,परार्थानुमानं)

12.अनुमानस्याधारोऽस्ति?

-व्याप्तिसम्बन्धः

13.व्याप्तिरस्ति?

-विशिष्टसम्बधः

14.न्यायदर्शने पदार्थानां सड्ख्यास्ति?

षोडश:

15.कतिद्रव्यानि?

नव

16.पृथिवी कतिधा?

-द्विधा(नित्या,अनित्या)

17.नित्या पृथिवी का?

-परमाणुरूपा

18.अनित्या पृथिवी का?

-कार्यंरूपा

19.का पृथिवी?

-गन्धवती

20रूपरहितस्पर्शवान् कः?

-वायुः

21वायुः कतिविधः?

-द्विविधः

22शब्दगुणकम् किम्?

आकाशम्

23 सामान्यं कतिविधम्?

-द्विविधम्(परम्,अपरम्) 

24.कति विशेषः?

-अनन्तः

25.समवायः कतिविधः

-1

26.अभावः कतिविधः

-पञ्चविधः

27भावभिन्नत्वं..........?

-अभावः

28.प्राचीन न्याय परम्पराकथ्यते?

-पदार्थमीमांसात्मकः

29.नव्यन्यायधारा कथ्यते?

-प्रमाणमीमांसात्मकः

30.न्यायसूत्राणां भाष्यकारोऽस्ति?

-वात्स्यायनः


ये थे तर्कभाषा से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न जो first grad,collage lecturer#net/set  परीक्षाओं में पूछे जाते हैं। आगे भी तर्कभाषा से संबंधित कुछ परीक्षोपयोगी जानकारी प्रदान करने का प्रयास किया जाएगा। 

धन्यवाद✍️

विशेष पोस्ट

तर्कसंग्रह के महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

तर्कसंग्रह के अनुसार९(9)द्रव्य कौनसे है।

तर्कसंग्रह के अनुसार कारण और उसके भेद










शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

हे कृष्ण....मुझे अर्जुन बना दीजिए#कविता


 हे कृष्ण.... मुझे अर्जुन बना दीजिए

भूलबैठा हुआ कर्तव्यो को अपने...

 उचित अनुचित  का ज्ञान करा दीजिए

हे कृष्ण.... मुझे अर्जुन बना दीजिए

मोह के धागो में मै क्यो इस तरह लिपट चुका हूँ

काटना चाहता हूँ .....पर नही काट रहा हूँ

हे कृष्ण..... मुझे अब तो स्वतंत्र कीजिए

 हे कृष्ण..... मुझेअर्जुन बना दीजिए।

अब तक बहुत युद्ध लडे़ पर इस युद्ध से क्यों भाग रहा हूँ

अपने ही अस्त्र-शस्त्र क्यो पटक दिए है मैने

हे कृष्ण..... कुछ तो बता दीजिए

हे कृष्ण..... मुझे अर्जुन बना दीजिए।

लक्ष्य ओझल हो रहा है निशाना कैसै लगाऊँ

पहले जैसी एकाग्र दृष्टि कैसे मैं पाऊँ

हे कृष्ण...मछली की आँख मुझे दिखा दीजिए

हे कृष्ण...मुझे अर्जुन बना दीजिए।

 अपनी शक्ति को भलीभाँति जानता हूँ फिर भी

 विचारो-के चक्रव्यूह से कैस निकल नही पा रहा हूँ

 मेरे सखा ...मेरा साथ दीजिए

हे कृष्ण.....फिर से खुद को सारथी बना लीजिए

 हे कृष्ण....मुझे अर्जुन बना दीजिए 

 

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Motivational lines

जिंदगी#zindagi


धन्यवाद


सोमवार, 4 जनवरी 2021

संस्कृत साहित्य के महत्त्वपूर्ण 50 प्रश्न#संस्कृत जाँच प्रश्न पत्र#sanskrit test paper

 1.  हर्षचरिते  हर्षवर्धनस्य भगिनी का  अस्ति ?

 राज्यश्री:


2.सम्राज्ञी विलासवती कस्य माता आस्ति?

चन्द्रापीडस्य


3.मेघदूते अंड्गीरस:भवति?

विप्रलम्भ श्रृंगार


4.पुण्डरीकस्य अनन्य मित्रम् अस्ति?

कपिञ्जलः

बाणभट्ट#हर्षचरित#कादम्बरी


5.स्वप्नवासवदत्तस्य विदूषक: कः?

वसन्तक:


6.स्वप्नवासवदत्तायां मन्त्री कः?

यौगन्धरायण


7.पण्डितराजजगन्नाथमते काव्यस्य कति भेदा: स्वीकृता:?

चत्वार:

उत्तमोत्तम

उत्तम

मध्यम

अधम्


8.स्वप्नवासवदत्तस्य नाटकस्य स्वप्नांक कः?

पञ्चमः


9.दुःखं न्यासस्य रक्षणम् इति सूक्तियुक्तं नाटकमस्ति?

स्वप्नवासवदत्तम्


10.शकारताडितां वसन्तसेनां मृत्युमुखात् कः मोचयति?

संवाहक:


11.आर्जव हि कुटिलेषु नीति: इति सूक्तियुक्तं नाटकमस्ति?

नैषधीयचरितम्


12.स्त्री स्वभावस्तु कातरःइति सूक्तियुक्तं नाटकमस्ति?

स्वप्नवासवदत्तम्


13.कामी स्वतां पश्यति इति सूक्तियुक्तं नाटकमस्ति?

अभिज्ञानशाकुन्तलम्


14.सर्वत्रार्जवं शोभते इति सूक्तियुक्तं नाटकमस्ति?

मृच्छकटिकम्


15.ध्वन्यालोकः कस्य कृतिरस्ति?

आनन्दवर्धनस्य


16.काव्यप्रकाशे कति परिच्छेदाः विद्यन्ते?

10


17.उत्तररामचरिते मैत्रावरूणि:पदं कस्य कृते प्रयुक्तम?

वसिष्ठस्य


18.वक्रोक्तिः काव्यजीवितम् कस्य इयं परिभाषा अस्ति?

कुन्तकस्य


19.तददोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि कस्येयं परिभाषा?

मम्मटस्य


20.योग्यताकांक्षासन्निधियुक्तः पदोच्चयः?

वाक्यम्


21.काव्यप्रकाशे काव्यप्रयोजनानि संख्या सन्ति?

षट्


1 यशसे

2 अर्थकृते

3 व्यवहारविदे

4 शिवेतररक्षतये

5 परनिवृत्तये

6 कान्तासम्मितयोपदेशयुजे


22.शक्तिग्रहं संकेतग्रहसाधनम् कतिविधम्?

अष्टम्


23.मनोऽनुकूलेऽथ मनसः प्रवणायितुम?

रतिः


24.वागादिवैकृतैश्चेतो विकासो?

हासः


25.हासः कस्य स्थायिभावः?

हास्यस्य


26.जुगुप्सा कस्य स्थायिभावः?

वीभत्सस्य


27.दोषेक्षणादिभिर्ग्रहां विषयोद्भवा

जुगुप्सा


28.नाटके नायकस्य कति भेदा स्वीकृता?

चत्वारः

नायक के भेद जानने के लिए✍️👎

नायक के भेद#दशरूपक

29.नाटकस्य नायक: कथं भवति?

धीरोदात्तः


30.प्रकरणस्य नायकं कथं भवति?

धीरप्रशान्तः


31.साहित्यदर्पणानुसारं फलप्राप्तौ अतित्वरान्वितः व्यापारः भवति

प्रयत्न


32.शान्तरसस्य स्थायिभाव कः?

शमः


33.साहित्यदर्पणस्य आचार्यः कः?

आचार्यः विश्वनाथः


34."अशोच्या हि पितुः कन्या सद्भर्तृप्रतिपादिता" यस्मिन् सूक्तिरियं अस्ति, तद् काव्यम्?

 कुमारसम्भवम्


35."अमृतेनेव संसिक्ताः चन्दनेनेव चर्चिता:" कं लक्षयति?

कालिदासम्


36.विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य स्वयं क्षेत्रमसाम्प्रतम् इयं सूक्ति कुत्र प्राप्यते?

कुमारसम्भवे


37.अल्पमात्रं समुदिदष्टं बहुधा यद्विसर्पति तत् किम्?

बीजम्


38.प्रायः व्यड्गयमप्रधानमेव सचमत्कारकारणम् जगन्नाथमते तत् भवति?

उत्तम काव्य


39.प्रायः सर्वोपरि भवति करुणावृत्तिसद्ररन्तरात्मा इत्यत्र सर्वशब्देन कस्य संकेतग्रहः भवति?

यक्षस्य

मेघदूत खण्डकाव्य#कालीदास की रचनाएँ


40.वेणीसंहारे दुर्योधनस्य मित्रमस्ति?

चार्वाक


41.वेणीसंहारम् इत्यस्मिन् पदे वेणी कस्या वेण्याः बोधिका अस्ति?

द्रौपदयाः


42.वेणीसंहारे नाटके कति अंकाः विद्यन्ते?

षट्(06)


43.रत्नावल्यां नाटिकायां रत्नावल्याः सहचरी का अस्ति?

सुसंगता


44.रत्नावली नाटिकायां कति अंका विद्यन्ते?

4


45.कस्य नाटके विदूषकस्य सर्वथा अभाव दरीदृश्यते?

भवभूतेः


46.महाकविभवभूतेः कति रूपकाः समुपलभ्यन्ते

3


47."गुणाः पूजास्थानं न च लिड्गम् "उक्तिरियं कुत्र प्राप्यते?

उत्तररामचरितम्

उत्तररामचरितम्#भवभूति का उत्तररामचरितम्


48."दैवविद्वांस: प्रमाणयन्ति" उक्तिरियं कुत्र प्राप्यते?

मुद्राराक्षसम्


49."रत्नं रत्नेन संगच्छते"उक्तिरियं कुत्र प्राप्यते?

मृच्छकटिकम्

मृच्छकटिकम्#शूद्रक की रचना


50."दुःख न्यासस्य रक्षणम् "उक्तिरियं कुत्र प्राप्यते?

स्वप्नवासवदत्तम्

 दोस्तों को यदि  प्रस्तुत प्रश्न पत्र परीक्षा की तैयारी की दृष्टि से लाभदायक लगा हो, तो अपने दोस्तों को शेयर अवश्य करें

धन्यवाद









































सोमवार, 14 दिसंबर 2020

शुक्रवार, 20 नवंबर 2020

Motivational poem#zindagi#quotes

 जिंदगी में बहुत कुछ सीखा है लेकिन अभी और सीखना बाकी है। 

बहुत तप  चुके अन्दर से हम अब शायद निखरना बाकी है। 

परिस्थितियां तो  हमें नहीं हरा पायी शायद अब उनका हारना बाकी है।

सपने तो बहुत देख चुके शायद अब सच होना बाकी है।

 थक कर बैठ नहीं सकते शायद अभी कुछ दूरी और चलना बाकी है।

हर पल  मुस्कुराना सीख चुके अब दुनिया मे छा जाना बाकी है।


विशेषदोस्तों, मैने कुछ समय पहले ही अपनी पुस्तक शोभा सृष्टि कविता संग्रह प्रकाशित करवायी है।जिसमे जीवन सेजुडी़ बातें जैसे माँ ,दोस्त,सपने,ख्वाहिशे, समय, मुस्कुराहट, जुनून,शिक्षक, कोरोना की भयावहता साथ ही अपनो कीएकता आदि बिषयो को कवितारूप में स्थान दिया है।

 यह पुस्तक Amazon,Flipcart,notion press.com पर उपलब्ध है। अधिक जानकारी के लिएनीचेदिये जा रहे लिंक पर क्लिक करे✍️👇और 

अपने दोस्तों के साथ भी शेयर करें🙏🙏

https://notionpress.com/read/shobha-srishti


मुझे उम्मीद है कि मेरा यह छोटा सा प्रयास

 सार्थक होगा आप सभी मेरा उत्साहवर्धन करेंगे 

धन्यवाद✍️🙏

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020

संस्कृत शिक्षण की विधियाँ(sanskrit teaching methods) संस्कृत शिक्षण की नवीन विधियाँ # विश्लेषणात्मक विधि#हरबर्टीय पंचपदी विधि#मूल्यांकन विधि#

  संस्कृत शिक्षण की विभिन्न विधियाँ

 "विश्लेषणात्मक विधि " यह विधि पूर्ण से अंश के प्रति  शिक्षण सूत्र परआधारित है ।

जैसा कि नाम से स्पष्ट होता है इस विधि में शिक्षक पहले तो पाठ के संपूर्ण अंशो को वर्गीकृत करता है फिर एक- एक अंश को ग्रहण कर उसका विश्लेषण करता है।

 संस्कृत शिक्षण में  यह विधि विशेष रूप से व्याकरण शिक्षण और कथा शिक्षण में प्रयुक्त होती है। उदाहरण के तौर पर समझ सकते है कि "संधि प्रकरण" का ज्ञान छात्रों को देना है  तो शिक्षक सर्वप्रथम संधि के सभी प्रकारों के बारे में बताता है। तत्पश्चात सभी प्रकारो के अंतर्गत आने वाली सभी संधियों को एक-एक करके समझाता है।

 इसी प्रकार संस्कृत में कक्षा शिक्षण कराते समय शिक्षक इस विधि के माध्यम से सर्वप्रथम संपूर्ण कथा का सार संक्षेप में सुनाता है  उसके पश्चात वह कथा मे आने वाली घटनाओ को क्रमबद्धरूप में प्रस्तुत  करता है । सभी पात्रों का एक-एक कर के वर्णन करता है। जिससे कथावस्तु छात्रों को अच्छी प्रकार से समझ में आती है।

विश्लेषणात्मक विधि के गुण

 इस विधि के माध्यम से शिक्षण कराने पर कठिन अंशों को समझाना आसान होता है, जिससे छात्र पढ़ने के लिए प्रेरित होते हैं।

 विश्लेषणात्मक विधि के दोष

 सभी प्रकार की विधाओं के शिक्षण में यह विधि प्रयुक्त नहीं की जा सकती।  

हरबर्टीय पंचपदी विधि  प्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री एवं मनोवैज्ञानिक हरबर्ट  महोदय के सिद्धांतों का अनुसरण करते हुए उनके शिष्यों रेन और शिलर ने पंच पदों से युक्त इस शिक्षण विधि को प्रस्तुत किया। 

पूर्व में हरबर्ट महोदय ने चार सोपानो से युक्त शिक्षण की एक प्रणाली प्रस्तुत की। जिसके चार सोपान निम्नलिखित है

1 स्पष्टता

2 सम्बद्धता(तुलना)

3 व्यवस्था(सामान्यकीरण)

4 विधि(प्रयोग)


 इसी शिक्षण प्रणाली में संशोधन करते हुए 4 पदों में एक पद और जोड़ते हुए इस विधि को प्रस्तुत किया जिसे हरबर्टीय पंचपदी विधि कहते हैं । 

हरबर्टीय  पंचपदी विधि के पांच सोपान 

1 प्रस्तावना

2 विषयोपस्थापना

3 तुलना

4 सामान्यीकरण

5 प्रयोग

 प्रस्तावना छात्रों के पूर्व ज्ञान को नवीन ज्ञान से जोड़ने के लिए शिक्षक छात्रों से कुछ प्रश्न पूछता है। जिसमें अंतिम प्रश्न समस्यात्मक होता है उस समस्या प्रश्न के आधार पर ही शिक्षक नवीन ज्ञान नवीन  की भूमिका तैयार करता है इन प्रस्तावना  प्रश्नों को पूछने का मुख्य उद्देश्य  यह ज्ञात करना है कि छात्र किसी विषय में कहां तक जानकारी रखते हैं और कहां से उन्हें नवीन जानकारी देनी है।  

प्रस्तावना प्रश्नों को तैयार करने के लिए शिक्षक किसी कथा को छात्रों के सामने सुना सकता है और उसमें से प्रश्न पूछ सकता है या किसी मानचित्र को दिखा कर या किसी प्रत्यक्ष वस्तु का उदाहरण देकर प्रश्न पूछता है प्रस्तावना प्रश्न में अंतिम प्रश्न समस्यात्मक होना आवश्यक है।

प्रस्तावना प्रश्नो को तैयार करते समय छात्रों की योग्यताओं,उम्र,रुचियो को ध्यान रखना आवश्यक है।तब ही प्रस्तावना की सफलता की संभावना बढ़ती है।


 विषयोपस्थापन प्रस्तावना प्रश्न पूछने के पश्चात शिक्षक इस सोपान का अनुसरण करता है इस सोपान में उद्देश्य कथन के साथ विषय का प्रस्तुतीकरण किया जाता है कक्षाकक्ष मे पढ़ाने के लिए शिक्षक द्वारा कक्षा में की जाने वाली क्रियाओं को सम्मिलित रूप से प्रस्तुतीकरण कहते हैं।

 गद्य पद्य व्याकरण आदि विधाओं के लिए प्रस्तुतीकरण का ढंग एक जैसा नहीं होता  जैसे पद्य पाठ में सस्वर वाचन होता है जबकि गद्य में नहीं

 तुलना काठिन्य निवारण के लिए शिक्षक द्वारा दृश्य श्रव्य समग्री का प्रयोग करना ही इस सोपान के अन्तर्गत आता है।

सामान्यीकरण पढाये गये पाठ का सार ,निष्कर्ष,नियम को शिक्षक द्वारा निकलवाना सामान्यीकरण है।

 जैस व्याकरण पाठ को विभिन्न उदाहरणो द्वारा  स्पष्ट करने के पश्चात शिक्षक उससे संबंधित नियम को छात्रों के सामने रखता है।

 इसी प्रकार गद्य पद्य पाठ का सार बताना या छात्रों से पूछना इस सोपान के अंतर्गत आता है।

 सामान्यी करण का मुख्य उद्देश्य पढी हुई विषय वस्तु कोछात्रों के लिए स्पष्ट रूप से बोधगम्य बनाना है।


प्रयोग  पाठ पढ़ाने के अंत में शिक्षक द्वारा दिया गया कक्षा कार्य ,गृह कार्य या अभ्यास कार्य इस सोपान के अंतर्गत आता है। 

इसका मुख्य उद्देश्य छात्रों द्वारा प्राप्त ज्ञान को परिपुष्ट करना है ।

 जिससे उनका ज्ञान चिरस्थायी हो और वह भविष्य में उसका प्रयोग करने में सक्षम बने

हरबर्टीय पंचपदी विधि के गुण

 यह विधि मनोवैज्ञानिक सिद्धांत पर आधारित है।

 इस विधि द्वारा शिक्षण क्रमबद्ध होता है।

 इसमें शिक्षण बोधगम्य हो जाता है।

  विधि के दोष

 सभी विषयों के शिक्षण में उपयोगी नहीं है जैसे विज्ञान विषय का शिक्षण इस विधि से नहीं किया जा सकता है। 

यह विधि  संस्कृत शिक्षण की सभी विधाओं के लिए प्रभावशाली नहीं है। 

 मूल्यांकन विधि  यह हरबर्ट की पंचपदी विधि का विकसित रूप है इसमें शिक्षक शिक्षण उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रत्येक सोपान में कक्षानुरूप क्रियाकलापों का संयोजन कर मूल्यांकन करता है जिससे उसे अपने शिक्षण कार्य की सफलता के संबंध में  संदेह नहीं रहता  शिक्षण कार्य मेंसुधार की अपेक्षा रहने पर उसमें सुधार कर सकता है ।

मूल्यांकन विधि के सोपान इसमें छह सोपान है ।

उद्देश्यों का निर्धारण करना

  उद्देश्यों को व्यवहार में लिखना

 पाठ्य बिंदु 

शिक्षक कार्य 

छात्र कार्य 

मूल्यांकन

 मूल्यांकन विधि के गुण 

यह एक मनोवैज्ञानिक विधि है।

इसमें शिक्षक और छात्र दोनों सक्रिय रहते हैं  शिक्षक छात्रों को  अभिप्रेरित करता है और पुनर्बलन  का अवसर मिलता है।

 


शिक्षक को अपने शिक्षण कार्य में सुधार की दिशा का ज्ञान होता है

शिक्षण के नवीनतम उपागम या नवीनतम विधियाँ

संस्कृत भाषा के शिक्षण को और अधिक सहज, सरल और प्रभावी बनाने के लिए आधुनिक युग में नए ढंग से शिक्षण कार्य किये जा रहे है जिसका उदेश्य संस्कृत भाषा को रटने की प्रवृति को दूर कर उसके सिद्धांतों को बोधगम्य बनाना, छात्रो में चिन्तन शक्ति का विकास करना है। यह सभी नवाचार संस्कृत शिक्षण की नवीनतम उपागम के अंतर्गत आते हैं।
  
संस्कृत शिक्षण के नवीनतम उपागम इस प्रकार है
 सूक्ष्म शिक्षण उपागम 
 समस्या समाधान उपागम
 प्रयोजना कार्य
 दल शिक्षण
 पर्यवेक्षण आधारित अध्ययन
 अभिक्रमित अनुदेशन 
संप्रेषण आधारित शिक्षण
 संग्रन्थन उपागम
निदानात्मक और उपचारात्मक परीक्षण

यहयह सभी नवाचार संस्कृत शिक्षण की नवीनतम उपागम के अंतर्गत आते हैं। सभी नवाचार संस्कृत शिक्षण की नवीनतम उपागम के अंतर्गत आते हैं।

विशेष संस्कृत शिक्षण की विधियों से संबंधित पोस्ट पढ़ने के लिए संस्कृत शिक्षण की विधियाँ लेवल पर क्लिक करें

 धन्यवाद







 

बुधवार, 7 अक्टूबर 2020

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 संस्कृत शिक्षण की नवीन विधियाँ

 लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति के पश्चात से प्रारम्भ जाने वाली विधियां जो संस्कृत शिक्षण में सहायक है वे सभी संस्कृत शिक्षण की नवीन विधियों के अंतर्गत आती है ।

 संस्कृत शिक्षण की नवीन विधियाँ निम्नलिखित है

  

पाठ्यपुस्तक विधि 

 यह संस्कृत शिक्षण की लोकप्रिय विधि है

 इसमें संस्कृत का शिक्षण कक्षा के स्तर के अनुसार बनाई गई पाठ्य पुस्तक पर आधारित होता है।

इस विधि के प्रवर्तक  वेस्ट महोदय है।

 इस विधि के अंतर्गत किया जाने वाला शिक्षण का केंद्र बिंदु पाठ्य पुस्तक होती है।

  गद्य,पद्य, व्याकरण पाठ का शिक्षण पाठ्य पुस्तक के अनुसार होता है।

 पुस्तकों का मुख्य उद्देश्य यह है कि इन पुस्तकों का अध्ययन करके विद्यार्थी शिक्षक की सहायता के बिना भी स्वतंत्र रूप से संस्कृत का ज्ञान प्राप्त कर सकते है।

 छात्र शिक्षक  की अनुपस्थिति में भी अध्ययन कर सकते हैं अभ्यास कर सकते हैं जिससे छात्रों में स्वावलंबन की भावना का विकास होता है।

इसमे मातृभाषा के द्वारा नवीन शब्दो का अर्थ बतलाया जाता है।

 पाठ्यपुस्तक  विधि के गुण 

.यह विधि  संस्कृत शिक्षण की प्रक्रिया में नियमितता लाती है 

.छात्रों को शुद्ध उच्चारण के अभ्यास का अवसर मिलता है 

. मातृभाषा के द्वारा नवीन शब्दों का अर्थ बताने से छात्रों के शब्द भंडार में वद्धि होती है।

 संस्कृत विषय के प्रति अनुराग उत्पन्न करने की यह सरलतम विधि है।

पाठ्यपुस्तक विधि के दोष  यह यांत्रिक विधि है उसमें शिक्षण का केंद्र बिंदु पाठ्य पुस्तक होती है जो मानसिक  शक्तियों के विकास में सहायक नहीं है ।

छात्रों में समीक्षात्मक दृष्टिकोण का विकास नहीं हो पाता है। 

पाठयपुस्तको से प्राप्त ज्ञान केवल सैद्धांतिक होता है, व्यवहारिक नही


 प्रत्यक्ष विधि  यह विधि  निर्बाध पद्धति ,सुगम पद्धति, मातॄ विधि,प्राकृतिक विधि आदि नामों से भी जानी जाती है।

 

प्रत्यक्ष विधि का सर्वप्रथम प्रयोग अंग्रेजी शिक्षण में 1901 में फ्रांस में गुईन ने किया। जबकि संस्कृत भाषा शिक्षण में प्रत्यक्ष विधि का प्रयोग प्रो.व.पी वोकील महोदय ने अल्फ्रिनस्टोन नामक विद्यालय मुंबई में किया

प्रत्यक्ष विधि की मुख्य विशेषता यह है कि में जिस भाषा का शिक्षण कराना है उसका माध्यम भी वही भाषा होती है जैसे संस्कृत शिक्षण में प्रत्यक्ष विधि के माध्यम से संस्कृत की शिक्षा संस्कृत भाषा के माध्यम से ही दी जाती है  अन्य किसी भाषा को माध्यम नहीं बनाया जाता 

संस्कृत शिक्षण में इस विधि के माध्यम से शिक्षण कराते समय कक्षा में   संस्कृतमय वातावरण बनाया जाता है जिसे सुनकर  और बोलकर संस्कृत भाषा के प्रयोग की प्रत्यक्ष शिक्षा प्राप्त होती है छात्र और शिक्षक दोनों ही संस्कृत के माध्यम से अपने भावों को प्रकट करते हैं

प्रत्यक्ष विधि के गुण

 प्रत्यक्ष विधि संस्कृत शिक्षण की सर्वोत्तम विधि है

  छात्र और शिक्षक दोनों के मध्य संभाषण होने से वे सक्रिय रहते है। कक्षा में सजीव वातावरण का निर्माण होता है।

 इस विधि में श्रवण और वाचन कौशल के पर्याप्त अवसर प्राप्त होते है। 

छात्रों में संस्कृत माध्यम से अपने विचारों को  स्वतंत्र रूप से प्रकट करने की क्षमता का विकास होता है ।

यह विधि छात्रों में संस्कृत के प्रति अभिरुचि और अभिवृति को बढ़ाती है।

 प्रत्यक्ष विधि के दोष 

यह विधि प्रतिभाशाली छात्रों के लिए उपयुक्त है परंतु सामान्य और मंदबुद्धि वालों को के लिए उपयुक्त नहीं है 

प्राथमिक स्तर पर इस विधि से शिक्षणकार्य नहीं कराया जा सकता  है ।

प्रत्येक विद्यालय में प्रत्यक्ष विधि से पढा़या जाना संभव नहीं है क्योंकि प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव पाया जाता है।

 वर्तमान  में  संस्कृत भाषा लोक व्यवहार की भाषा नहीं होने के कारण कि इस विधि द्वारा संस्कृत शिक्षण की गति मंद रहती है।

 संस्कृत की प्रत्येक विधा को इस विधि के माध्यम से रुचिकर नहीं बनाया जा सकता जैसे पद्य पाठ पढ़ाते समय सौंदर्य अनुभूति  जैसे सूक्ष्म भावों को स्पष्ट करने में मातृभाषा अधिक सहायक है।

निष्कर्ष पाठ्यपुस्तक विधि संस्कृत शिक्षण की सबसे लोकप्रिय विधि है जबकि प्रत्यक्ष विधि संस्कृत शिक्षण की सर्वश्रेष्ठ विधि है।

विशेष  शेष नवीन शिक्षण विधियों के बारे में हम अगली पोस्ट में जानेंगे। उम्मीद करती हूं इस पोस्ट में जिन दो विधियों के बारे में बताया गया है । दोनों का अध्ययन परीक्षा की दृष्टि से बहुत आवश्यक है।

Read more   संस्कृत शिक्षण की विधियों से संबंधित पूर्व में लिखी गई पोस्ट पढ़ने के लिए नीचे दी जा रही लिंक पर क्लिक कीजिए

संस्कृत शिक्षण की प्राचीन विधियाँ -व्याकरण अनुवाद विधि याँ भण्डारक विधि

व्याकरण विधि,व्याख्या विधि,कथानायक विधि

पाठशाला विधि