मूकता की जंजींरें तोड़ जो कुछ समय पूर्व मै मुखरता की सीढ़ी चढ़ने लगा। बुनने लगा स्वप्न सजीले जो बंद थे ह्रदय के किसी कोने में इन सपनों की तस्वीर लिए सजाने कोई नया आशियाना अपनी ही मस्ती में चलता रहा नयी उमंग लिए। माना कि मेरे सामने मंजिल का हसीन मंजर था लेकिन सफर में अभी जगह-जगह बहुत बंजर था चेहर पर थी मुस्कान अमिट लेकिन चुनौतियों का खंजर था इकतरफा बढ़ने लगा लगाव अपनी ख्वाहिशों का लेकिन सशक्त हुआ प्रभाव समय की साजिशो का प्रतिकूलता की रस्साकशी मुझे खींचने लगी अपनी ओर छूटने लगी मेरी बंद मुट्ठी से मेरे सजीले सपनों की डोर घर करने लगा डर अब ह्रदय के उस कोने में जहाँ से निकाली थी मैने सपनों की तस्वीर लेकर चला था उसे मनचाहे रंगों से भरने अपनी मूकता को जो मैने अभी मुखर किया था क्या समय की विमुखता में बँध जायेंगे म...
कविता का शीर्षक-"नही छोडेंगे इस रणको बीच मेंअधूरा नहीं छोड़ेंगे इस रण को बीच मे अधूरा सब मिलकर जीत लेंगे इसे पूरा। यहाँ न किसी धर्म,जाति,संप्रदाय, अमीर,गरीबी का कवच काम नहीं आएगा यह रण तो हमारी एकता की मिसाल बन जाएगा । नहीं छोड़ेंगे इस रण को बीच में अधूरा सब मिलकर जीत लेंगे इसे पूरा। यहां काम नहीं आएगी कोई राजनीतिक घृणा यह रण तो राजनीति के दलदल से दूर ले जाएगा। नहीं छोड़ेंगे इस रण को बीच में अधूरा सब मिलकर जीत लेंगे इसे पूरा । यहां काम नहीं आएगी आरोप-प्रत्यारोपो की झड़ी यह रण तो भाईचारे और परोपकार से जीता जाएगा। नहीं छोड़ेंगे इस रण को बीच में अधूरा सब मिलकर जीत लेंगे इसे पूरा न हीं चलेगी यहां तलवारे,न ही धनुष बाण चलेंगे न ही गिरने देंगे लहू की एक बूंद इस धरा पर यह रण तो इंसानियत की कसौटी पर लड़ा जाएगा। नहीं छोड़ेंगे इस रण को बीच में अधूरा सब मिलकर जीत लेंगे इसे पूरा । न हीं कर पाएगा अपनों को अपनों से दूर यह रण तो...