" नायक के भेद" संस्कृत साहित्य में दस रूपक माने गये है धनञ्जय ने अपने दशरूपकम् में रूपक के दस भेद माने है नाटक,प्रकरण,भाण,व्यायोग समवकार,डिम ईहामृगअंक, वीथी,प्रहसन ये रूपक के दस भेद है। रूपक के 10 प्रकारो में प्रत्येक की अपनी विशिष्टता है। जिसका करण कथानक (वस्तु), नायक (नेता), रस में भिन्नता है नाट्यशास्त्रीय दृष्टि से ये तीनों रूपकों के महत्त्वपूर्ण तत्व है। इस Post में हम नाट्यशास्त्र के महत्त्वपूर्ण तत्व नेता अथवा नायक की कोटि (प्रकार) के बारे में जानेंगे। नेता अथवा नायक किसे कहते है सभी रूपकों का एक नायक होता है जिसे अंत में धर्म, अर्थ,कामरूपी फलों में से कोई न कोई फल अवश्य मिलता है। फल ...
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आपके द्वारा प्रस्तुत कथन बाणभट्ट द्वारा रचित "कादंबरी" के शुकनासोपदेश से संग्रहित है जिसमें चंद्रापीड़ का अमात्य शुकनास चंद्रापीड़ को उसके राज्याभिषेक से पूर्व उपदेश देता है इस कथन में वह लक्ष्मी के स्वभाव के संबंध में कहता है की निश्चय ही संसार में ऐसी कोई वस्तु परिचय की उपेक्षा करने वाली नहीं है जैसी कि यह नीच स्वभाव वाली दुष्टा लक्ष्मी है अमात्य शुकनास चन्द्रापीड़ से लक्ष्मी के दोषों पर चर्चा करते हुए कहता है कि यह लक्ष्मी क्षीरसागर में मंदराचल के द्वारा किए गए मंथन से उत्पन्न "भंवर"संस्कार से युक्त होने के कारण चंचल स्वभाव वाली है इसने परिजात के पल्लवो से आसक्ति, चंद्रकला से कुटिलता, उच्चैश्रवा अश्व से चंचलता, कालकूट से सम्मोहन शक्ति, मदिरा से मादकता और कौस्तुभ मणि से क्रूरता को ग्रहण किया है। यह प्राप्त हो जाने पर भी बहुत मुश्किल से पाली जाने वाली है। लक्ष्मी किसी व्यक्ति के परिचय कुलीनता, विद्वता आदि को नहीं देखती। चंचला होने के कारण है यह एक स्थान पर टिक नहीं पाती है
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