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गुरुवार, 3 अक्टूबर 2019

महर्षि वाल्मीकि की रामायण #ramayan questions #rpsc 1 grade & all sanskrit exams #रामायण में कितने कांड है?

चतुर्विंशति साहस्त्री संहिता रामायण ,शत साहस्त्री संहिता महाभारत है।
 रामायण मे सात कांड है, महाभारत मे 18पर्व है।
रामायण का सबसे बडा कांड युद्धकांड/लंकाकांड है। 128सर्ग
रामायण का सबसे छोटा कांड किष्किन्धा कांड है 67 सर्ग रामायण मे प्रधान/अंगीरस करुण रस, महाभारत मे प्रधान रस शान्त है।

  तुलसीदास रचित श्री रामचरितमानस का चित्र# ramcharitmanas image
तुलसीदास कृत रामायण


महाभारत की रीति पांचाली
महाभारत का स्वरूप:संस्कृत साहित्य को देन
 वेद और वैदिक साहित्य# संहिता, ब्रह्मण,आरण्यक,उपनिषद
श्रीमदभागवतगीता # Shrimad Bhagwat Geeta #श्रीमद्भागवत गीता में कितने अध्याय हैं?                         
Q महर्षि बाल्मीकि किस नदी के तट पर  स्नान करने जाते हैं?
 A.तमसा नदी के तट पर

Q पंचवटी किस नदी के तट पर स्थित है?
 Aगोदावरी नदी

Q लंका नगरी किस पर्वत पर स्थित थी?
A त्रिकूट पर्वत

Qराजा- सगर आख्यान रामायण के किस कांड में है?
A बालकांड में

Q राजा सगर के 60,000पुत्रों को किसने श्राप दिया था?
A कपिल मुनि ने

Q श्री राम और सुग्रीव की मित्रता का वर्णन किस कांड में है A.किष्किंधा कांड

राम और सुग्रीव की मित्रता किसने करवाई थी?
A. श्री हनुमान ने

Qश्री राम और हनुमान का मिलन किस पर्वत पर हुआ था? A.ऋषिमूक पर्वत

QRam aur Lakshman ko Bala atibala Vidya kisne pradan ki राम और लक्ष्मण को बला अतिबला विद्या किसने प्रदान की?
A.विश्वामित्र ने

Q.महर्षि बाल्मीकि का बाल्यकाल में नाम था ?
A.रत्नाकर

Qअहिल्या का उद्धार, राम द्वारा धनुष भंग, राम और सीता का विवाह ,परशुराम का क्रोध आदि का वर्णन किस कांड में हुआ है ?
A.बालकांड में

Q अहिल्या के पति का नाम?
A. ऋषि गौतम

Q समुद्र मंथन की कथा रामायण के किस कांड में है ?
A.बालकांड में

Q समुद्र मंथन से जो अश्व निकला उसका नाम था?
A. उच्चै:श्रवा

Q.महर्षि वशिष्ठ की पत्नी का नाम?
A.अरुंधति

Q.राजा जनक का मूल नाम क्या था?
A. शिरोध्वज

Q श्रीराम ने स्वयं का दूत बनाकर किसे लंका भेजा था?
A.अंगद को

Q. परशुराम के पिता का नाम था?
A. जमदग्नि

Q. महर्षि बाल्मीकि राम लक्ष्मण को किस प्रयोजन के लिए अपने साथ ले गए?
A. आश्रम की रक्षा के लिए

Q.बाली की पत्नी का नाम था?
A. तारा

Q.विश्वकर्मा के अवतार थे?
 A.नल नील

Q"राम और लक्ष्मण के शबरी के आश्रम मे जाने का वर्णन है " किस कांड में है?
A. अरण्यकांड मे

Q.शबरी के गुरु का नाम था?
 A.महर्षि मतंग

Q.जटायु -संपाती किसके पुत्र थे ?
A.अरुण के
Q. कौसल देश की राजधानी का नाम था?
A. अयोध्या Ram ka rajyabhishek Ram Bharat ka Milan
/> नल नील द्वारा समुद्र पर सेतु बंध , मेघनाथ, रावण का वध सीता की अग्नि परीक्षा, ब्रह्मा द्वारा राम की स्तुति,इन्द्र और दशरथ के उपदेश किस कांड में है
युद्ध कांड/लंकाकाण्ड में

बालकांड के समान अनेक इतिहास और पौराणिक आख्यानो का वर्णन किस कांड में है? Q.राम भरत का मिलन ,राम का राज्याभिषेक की घटनाएं रामायण के किस कांड में है?
A. लंका कांड
याद रखिए राम के राज्याभिषेक की तैयारी का प्रसंग अयोध्या कांड में है जबकि राम का राज्याभिषेक लंकाकांड में हुआ है 

Q.सीता संबंधित जन अपवाद, सीता परित्याग, लव कुश के जन्म ,लवणासुर का वध आदि घटनाओं का वर्णन किस कांड में है?A. उत्तरकांड में

Q. उत्तरकांड में सर्गो की संख्या है?
A. 111

Q.लवणासुर का वध किसने किया?
A.शत्रुघ्न ने
रामायण के कांड और उनमें सर्गो की संख्या/Ramayan questions रामायण के कांड और सर्गो की संख्या 

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2019

रामायण महाकाव्य से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य # महर्षि वाल्मीकि की रामायण

 रामायण महाकाव्य से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य 

रामायण/ramayan
रामायण/ramayan



रामायण का समय 500ईसा पूर्व
 सगो की संख्या--645
कुल कांड --7,24000 श्लोक
रचयिता -महर्षि वाल्मीकि (आदि कवि की उपाधि)
रामायण महाकाव्य में मुख्य रस -- करुण रस
 रामायण में  सबसे अधिक बार प्रयुक्त छंद कौन सा है ?-अनुष्टुप छंद

Note आदि कवि महर्षि वाल्मीकि के मुख से सर्वप्रथम जो श्लोक निकला था वह अनुष्टुप छंद मे ही था

रामायण के सात कांडों के नाम तथा उनमे  सर्गो की संख्या

b>


जैसा की आप सभी जानते है कि रामायण में कुल 7कांड है जिनमें क्रमबद्ध रूप से रामायण की कथा को आगे बढ़ाया गया है।इन सभी कांडों का  इस महाकाव्य में बहुत ही महत्व है आइए हम रामायण के सभी कांडों में वर्णित महत्वपूर्ण  घटनाओं के बारे में  कुछ जानकारी प्राप्त कर लेते हैं

1.बालकांड (Bal Kand)--- यह रामायण का प्रथम कांड इसमें कुल77सर्ग है रामायण  के बालकांड में प्रारंभिक चार सर्गो में रामायण रचना की पूर्वपीठिका दी गई है जिसमें नारद महर्षि वाल्मीकि को राम का जीवन चरित बताते है इसके पश्चात  कौच युगल करुण क्रन्दन सुनकर को सुनकर  बाल्मीकि के हृदय में करुणा उत्पन्न होती है अत्यंत क्रोधित हो कर शिकारी को शाप देते हैं यह श्लोक करुण रस से भरा हुआ था इसके पश्चात ही बाल्मिकी राम कथा लिखने में संलग्न हुए।
  बालकांड में राजा दशरथ की नीति और उनका शासन , संपादित पुत्रेष्टि यज्ञ ,राम लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्न का जन्म ,विश्वामित्र द्वारा राम लक्ष्मण को अपने साथ ले जाना, विश्वामित्र द्वारा दोनों भाइयों को अनेक विद्याओं  की शिक्षा देना, विश्वामित्र द्वारा सुनाई गई गंगा पार्वती के जन्म ,कार्तिकेय का जन्म वृतांत ,राजा सागर और उनके साथ हजार पुत्रों का जीवन ,भागीरथ का जीवन,  गंगा का पृथ्वी पर अवतरण, दीति और अदीति , समुद्र मंथन,गौतम अहिल्या, वशिष्ठ और विश्वामित्र का पारस्परिक संघर्ष, त्रिशंकु की महत्वाकांक्षा, राजा अम्बरीष, विश्वामित्रका तपोवन, सीता स्वयंवर के प्रसंग वर्णित है। 

अयोध्या कांड-अयोध्या कांड में एक 119सर्ग है इसमें राम के राज्याभिषेक की तैयारी, मंत्रा के बहकाने पर कैकेई द्वारा राजा दशरथ से  दो वर माँगना,  जिनमें राम के लिए 14 वर्ष का वनवास,और अपने पुत्र भरत का राज्याभिषेक,राम का लक्ष्मण और सीता सहित वन को गमन, दशरथ का राम के वियोग में प्राणत्याग देना ,भारत द्वारा राज्य को ठुकराना, अपने भाई राम को मनाने के लिए चित्रकूट  गमन, राम की अयोध्या आने के लिए अस्वीकृति भारत द्वारा राम की पादुकाओं को अयोध्या लाना , भरत का शपथ ग्रहण,राम भारत को राजधर्म का उपदेश देते है जाबालि का नास्तिक मत, राम द्वारा उसका खंडन,राम का चित्रकूट छोड़कर दंडकारण्य में प्रवेश का वर्णन इसी कांड में है 

अरण्यकांड --इसमें  75सर्ग है इसमें राम लक्ष्मण सीता का दण्डकारण्य में निवास करना,बिराध जैसे राक्षसों का वध करना, पंचवटी में प्रवेश, शूर्पनखा का आगमन , उसका राम लक्ष्मण से विवाह के लिए याचना ,लक्ष्मण द्वारा उसकी नाक काटना ,खरदूषण आदि  चौदह हजार राक्षसों का वधकरना ,रावण द्वारा सीता का हरण ,जटायु द्वारा सीता की रक्षा के लिए प्रयास करना, जटायु का रावण द्वारा वध ,  राम लक्ष्मण सीता की खोज करते है ,  राम की कबंध राक्षस से भेंट ,शबरी प्रसंग ,शबरी द्वारा सुग्रीव सेेे मित्रता का  परामर्श देना ,पंपा सरोवर के दर्शन आदि घटनाएं यहाँ वर्णित है। 

b>किष्किंधा कांड --इसमेंं 67सर्ग है इस कांड की प्रमुख घटनाएं है --हनुमान द्वारा राम और सुग्रीव की मित्रता कराना, राम द्वारा  सुग्रीव के भाई बाली का वध करना ,सुग्रीव और अंगद का राज्याभिषेक ,सुग्रीव का राम को सीता माता की खोज के लिए वचन देना, राम का प्रस्त्रवणगिरी पर 4 माह तक  जीवन यापन,  सुग्रीव द्वारा वानर सेना को सीता माता की खोज करने का आदेश, हनुमान की  संपाति से भेंट, संपाति द्वारा सीता केेेे रावण की अशोक वाटिका में होने की सूचना , जामवंत  हनुमान को उनकी स्वयं की शक्ति को जगाने के लिए उद्बोधन करते हैं। 

सुंदरकांड -- इसमें68 सर्ग है हनुमान का लंका में अशोक वाटिका में पहुंचना सीता मां के दर्शन करना सीता मां को श्रीराम की अंगूठी देना, श्रीराम का संदेश सुनाना अशोक वाटिका का हनुमान द्वारा उजाड़ना, लंकापति रावण के आदेश पर हनुमान की पूंछ में आग लगाना ,हनुमान का समुद्र में पहुँचकर  आग बुझाना  पुन: सीता का संदेश लेकर  अपने स्वामी श्री राम तक पहुंचने का वर्णन है

युद्ध कांड या लंका कांड रामायण के 7 कांडों में यह का सबसे बड़ा है इसमें  128 सर्ग है।इस कांड के अंतर्गत राम रावण के युद्ध का वर्णन है राम रावन को मारकर किस प्रकारअयोध्या आते हैं ,का वर्णन  है  विभीषण का राज्यभिषेक, सीता की अग्नि परीक्षा, ब्रह्मा द्वारा भगवान राम की स्तुति, दशरथ और इन्द्र के उपदेश ,भारद्वाज आश्रम से हनुमान को भारत के पास अयोध्याआगमन की सूचनार्थ भेजना, रामभरत का मिलन, राम का राज्याभिषेक राम द्वारा प्रजा पालन आदि के वृतांत इसमें है
उत्तर कांड इसमें कुल एक सौ ग्यारह सर्ग है कुछ विद्वान इस काण्ड को प्रक्षिप्त मानते हैइस कांड में भी बाल कांड के समान अनेक इतिहास और पौराणिक  आख्यानो कीभरमार हैसीता का जनअपवाद, सीता का परित्याग राजा नृग उर्वशी,ययाति महर्षि वशिष्ठ के आख्यान , शत्रुघ्न द्वारा लवणासुर का वध, लव कुश का जन्म, राम का अश्वमेध यज्ञ करना लव कुश का रामायण,सीता का पृथ्वी में समाना कौशल्या आदि माताओ  का परलोक गमन , लव कुश का राज्य अभिषेक महत्व स्थान श्री राम महाप्रस्थान जैसे सभी वृतांत यहाँ वर्णित है।  

Nishkarsh इस प्रकार समग्र रूप में देखा जाए तो रामायण में कुल 645 सर्ग है और 24000 Shlok है बालकांड के प्रारंभ में 500 सर्गो उल्लेख है अत:145 सर्ग प्रक्षप्तांश प्रतीत होते है।


रामायण महाकाव्य केकथानक को आधार बनाकर रची गई रचनाए   

b>भास प्रणीत अभिषेक नाटक, प्रतिमा नाटक 
मुरारी प्रणीत  अनर्घराघव महाकाव्य  
जयदेव प्रणीत प्रसन्न राघवम्
 भवभूति प्रणीत उत्तररामचरितम् महावीरचरितम् नाटक  
कालिदास प्रणीत रघुवंशम् महाकाव्य  
 कुमार दास प्रणीत जानकी हरण महाकाव्य

 रामायण और महाभारत दोनों आर्ष महाकाव्य माने जाते हैं

मंगलवार, 6 अगस्त 2019

मनुस्मृति# सप्तम अध्याय#all sanskrit exam # मनुस्मृति के अनुसार राजव्यवस्था

  मनुस्मृति-- सप्तम अध्याय                                       
मनुस्मृति #सप्तम अध्याय
मनुस्मति का सप्तम अध्याय
                                            
                                                                                                                 मनुस्मृति के सप्तम अध्याय में राजा के कर्तव्यों का वर्णन करते हुए मनु कहते हैं कि राजा को हमेशा विनयशील रहना चाहिए।  विनय रहित होने के कारण अनेक राजा धन संपत्ति तथा कुटुंब सहित नष्ट हो गए थे तथा जंगलों में रहने वालों ने भी  विनयशील होने के कारण राज्यों को प्राप्त किया                                                                                          इस संबंध में उदाहरण देते हुए कहते हैं राजा वेन नहुष सुदास,निमि आदि  विनय शील नहीं होने के कारण नष्ट हो गए जबकि पृथु तथा मनु ने विनय के कारण राज्य को प्राप्त किया धनपति कुबेर ने विनय से धन ऐश्वर्य को तथा विश्वामित्र ने ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया।                                                                                                                           राजा को जितेंद्रिय होना चाहिए मनु कहते है।कि राजा के लिए सभी विकारो से दूर रहना अनिवार्य है                                                                                                            काम और क्रोध से उत्पन्न व्यसनो के त्याग के संबंध में चर्चा करते हुए मनु कहते हैं कि कुल 18 व्यसन होते है।जिनमे से काम से उत्पन्न 10 व्यसन तथा क्रोध से उत्पन्न  8 व्यसन परिणाम में बहुत दुखदाई होते हैं अतः राजा को उन्हें प्रयत्नपूर्वक  त्याग देना चाहिए ।                                                                                                         काम से उत्पन्न 10 व्यसन कौनसे है ।                                                                                                     शिकार करना, जुआ खेलना ,दिन में सोना ,दूसरे की निंदा करना स्त्रियो मे आसक्ति,नशा करना, नाचना ,गाना ,बजाना ,व्यर्थ घूमना                                                                                                                                 क्रोध से उत्पन्न आठ व्यसन कौनसे है।                                                                                                     दूसरों की चुगली करना, दुस्साहस करना, द्रोह करना, ईर्ष्या करना,  दूसरों के गुणों में दोष निकालना दूसरे के धन का अपहरण करना, वाणी में कठोरता लाना, निरपराधी को मारना                                                                                                                                                    काम और क्रोध से उत्पन्न व्यसनों का मूल कारण लोभ को माना गया है इसलिए राजा  लोभ को जीते ।                                                                                                          व्यसन को मृत्यु से भी अधिक भयंकर बताया गया है क्योकि व्यसनी व्यक्ति मरकर नरक मे जाता है जबकि अव्यसनी मरने के पश्चात स्वर्ग मे जाता है।

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js"> b>Read also  मनुस्मृति#सप्तम अध्याय#all sanskrit exam .                                                                                                                                               वैदिक साहित्य*अग्नि सूक्त *ऋग्वेद 1.1                                                                                                       इस प्रकार मनुस्मृति की दोनों पोस्टों में आपने  राजा के अधिकार और कर्तव्य के बारे में पढ़ा जिससे की राजव्यवस्था  सुव्यवस्थित हो।  राजा के अधिकार और कर्तव्यो का वर्णन ही मनुमृति के सप्तम अध्याय का मूल विषय है।

बुधवार, 31 जुलाई 2019

मनुस्मृति#सप्तम अध्याय #all sanskrit exam

    मनुस्मृति- सप्तम अध्याय।                                                                                                                मनु  ने  मनुस्मृति के सप्तम अध्याय में राजा के प्रभुत्व और उसकी राज व्यवस्था में दंड नीति की महत्ता ,काम,  क्रोध से उत्पन्न दोषो की चर्चा तथा राज्यव्यवथा  मे मंत्रियो  गुप्तचरो और दूतो की भूमिका का वर्णन किया है                                                                                                                                                                  मनुस्मृति के सप्तम अध्याय के अनुसार  राजा पृथ्वी पर ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है। राजा मे 8 देवताओं का अंश माना गया है जिनमें यम कुबेर सूर्य अग्नि चंद्रमा कुबेर  इन्द्र,वरुण शामिल है।                                                                                                                                                                               इसमे बताया गया है कि  राजा के बालक होने पर भी उसका अपमान नहीं करना चाहिए क्योंकि वह पृथ्वी पर मनुष्य रूप में देवता होता है ।                                                                                                                   मनुस्मृति के अनुसार राजा के साथ अज्ञानता के कारण ईर्ष्याभाव नहीं रखना चाहिए।   क्योंकि जिसके प्रति वह कुपित होता है उसके विनाश का शीघ्र मन राजा बना लेता है है।                                                                                          मनुस्मृति में राजा की तुलना अग्नि से करते हुए कहा गया है कि जिस प्रकार लापरवाही करने पर अग्नि घर को नष्ट कर देती है उसी प्रकार राजा अपने विरोधियों का पशु,धनधान्य सहित सर्वनाश कर देता है                                                                                                                         जिस राजा की प्रसन्नता में कमलवासिनीलक्ष्मी का वास होताा है पराक्रम में विजय तथा क्रोध में मृत्यु का वास होताा है  वही राजा सभी प्रकार से तेजस्वी होता है।    दंड के संबंध में कहा गया है कि राजा के निमित्त तथा  सभी प्राणियों की  रक्षा करने वाले करने के लिए तेजमय तथा पुत्रतुल्य दंड को ईश्वर ने रचा है।                                                                                                                                      मनुस्मृति में दंड की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा गया है कि दंड ही चारों आश्रमोंं के धर्म का प्रतिनिधि है ।दंड के कारण ही सभी प्राणी अपने अपने धर्म के अनुसार आचरण करते हैं दंड ही राजा है ,परम पुरुष है ,प्रजा पर शासन करनेे वाला है  राजा का कर्त्तव्य है कि है वह देश काल के अनुसार पूरी तरह विचार करते हुए अन्याय करने वालेे को उचित दंड दे                                                                                                              आगे दंड नीति की प्रयोग के परिणाम पर प्रकाश डालते हुए कहा गया है कि जो राजा दंड का प्रयोग नियम से सही ढंग से करता है वह धर्म धन तथा काम से वृद्धि पाता है  परंतु धर्म से पलायित राजा अपने कुटुंब सहित इससे नष्ट हो जाते है  तत्पश्चात  किला राष्ट्र तथा चराचर समस्त लोक का नाश कर डालता है तथा अन्तरिक्ष वासी मुनि और देवताओं को भी पीड़ित करता है दुःख पहुंचाता है।                                                                                                                इसलिए राजा को न्याय पूर्वक व्यवहार करना चाहिए जो राजा न्याय का पोषक होता है ।उस राजा की यश पताका  इस लोक में जल मेंं तेल  के बिंदुु की  भाँति फैलती है।                                                                                                         जो राजा न्याय का पोषण नही करता है तथा अपने हृदय के अधीन नहीं रहता है    उसका यश संसार मे जल मे गिरी हुई तेल की बूँदो की तरह  सिकुड जाता है।                                                                                                      शेष विषयो के बारे अगली पोस्ट में चर्चा करेंगे ।                                                                                                                      please like share and comments                                                                                                                                                                    धन्यवाद आप सभी का ।  

शुक्रवार, 5 जुलाई 2019

वैदिक साहित्य **अग्नि सूक्त*( 1.1)#net#jrf#set#collage lecturer exam in sanskrit

             वैदिक साहित्य **अग्नि सूक्त**                                                                       
अग्नि सूक्त का परिचय
वैदिक साहित्य--**अग्नि सूक्त**  
                                                                                     अग्नि सूक्त का परिचय                                                                                                                                 अग्नि सूक्त  Rigveda के प्रथम मण्डल का प्रथम सूक्त है जिसके स्तुति कर्ता महर्षि मधुच्छन्दा/विश्वामित्र है। यह सूक्त इन्द्र सूक्त के पश्चात दूसरा सबसे बडा सूक्त है जिसमें 200सूक्तो में अग्नि देवता की स्तुति की गई है। इसके मंत्रो में गायत्री छन्द का प्रयोग हुआ है                                                                                                                                                                       
नोट:-गायत्री छंद वैदिक छंद है जिसका केवल वैदिक साहित्य  में ही प्रयोग हुआ है ।गायत्री छंद में कुल 24 अक्षर होते है।                                                                                                                                                                                                                      
अग्नि सूक्त 1.1 में कुल 9 मंत्र है जिनको यहाँ सामान्य रूप में बताया जा रहा है-                                                                                                                                     
  प्रथम मंत्र में अग्नि देव को कामनाओ को पूरा करने वाला, यज्ञ का पुरोहित,दान आदि दिव्य गुणो से सम्पन्न, विभिन्न रत्नो  अर्थात यज्ञ के फलस्वरूप प्राप्त होने वाले श्रेष्ठ पदार्थो  को धारण करने वाला आदि सभी नामो से सम्बोधित कर स्तुति का प्रारम्भ किया गया है।                                                                                                                     
दूसरे मंत्र में बताया है कि अग्नि देव  की प्राचीन भृगु आदि के द्वारा भी स्तुति की जाती थी और अब नवीन विश्वामित्र आदि महर्षियों द्वारा स्तुति की जाती है अत:अग्नि देव सभी कालो में स्तुति योग्य माने गये हैं।                                                                                                    &nbs p;                          

तीसरे मंत्र में अग्नि देवता की स्तुति का सुफल बताया है कि अग्नि देवता की स्तुति से यजमान प्रतिदिन पोषण को प्राप्त होने वाले, दानादि के द्वारा यश के प्राप्त होने वाले,पुत्र आदि  वीरो से युक्त धन को प्राप्त करता है।                                                                                                               
चतुर्थ मंत्र में कहा गया है कि तुम जिस हिंसा से रहित यज्ञ को सभी दिशाओ में प्राप्त कर रहे हो वह यज्ञ ही सभी देवताओ की संतुष्टि के लिए प्राप्त होता है।                                                                                                     
पाँचवे मंत्र में अग्निदेवता को होम को निष्पन्न करनेवाला,अतीत और भविष्य को जानने वाला ,मिथ्या से रहित, विविध प्रकार की कीर्ति से युक्त वालो मे श्रेष्ठ, आदि गुणो से स्तुति करते हुए अन्य देवताओ को इस यज्ञ में लाने की प्रार्थना की गई है।                                                                                                                                         
छठे मंत्रमें अग्नि देव को अपने यजमान के लिए सभी प्रकार की वस्तुओ को प्रदानकरने वाला बताते हुए उसके कल्याणकारी स्वरूप को प्रदर्शित किया है।                                                                                                 
सातवे मंत्र में नमस्कार का भाव है।                                                                                                               

आठवे मंत्र में अग्नि देवता के अन्य विशेषण है -प्रकाशमान, हिंसा रहित यज्ञो का रक्षक, सत्य कर्मो को पुन:पुन प्रकाशित करने वाले और  घर की यज्ञशाला में बढ़ने वाले हे अग्नि देव !नमस्कार करते हुए आपके समीप हम जाते है।                                                                                                                                     
 नवे और अंतिम मंत्र में अग्नि देव को पितातुल्य अपनी संतान का सर्वहितैषी बनने की कामना  है।                               

विशेष :-  दोस्तों  अग्नि सूक्त ऋग्वेद का बहुत ही महत्त्वपूर्ण सूक्त माना जाता है जिसे विभिन्न नामों से संबोधित किया गया है।अग्नि देवता का हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है चाहे वह आध्यात्मिक हो भौतिक ह या धार्मिक
                                                                                                                                                         संस्कृत के विद्यार्थियों के लिए परीक्षा की दृष्टि से इसका अध्ययन बहुत ही महत्वपूर्ण है सामान्य रूप मे भी अध्ययन  ज्ञानवर्धक है । 

👉 वैदिक साहित्य प्रश्नोत्तरी (संस्कृत साहित्य)

बुधवार, 26 जून 2019

वेद और वैदिक साहित्य #संहिता,ब्राह्मण,आरण्यक,उपनिषद#वैदिक साहित्य के महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर #vedic sahitya in sanskrit

                                                                             नमस्कार दोस्तो,                                                                                          

 एकबार पुन:आप सभी का स्वागत है जैसा कि आप सभी जानते है वेद और वैदिक साहित्य हमारे संस्कृत विषय में बहुत महत्त्व रखता है क्योकि सर्वप्रथम वेदो की रचनाएँ हुई। उसी के पश्चात लौकिक साहित्य की रचना आरम्भ हुई। वेदो के रचनाकाल के विषय में मत्यैक नही पाया जाता है क्योकि वेदो के रचनाकाल को ठीक प्रकार से निर्धारित करना मनुष्य के लिए पूर्णतया संभव नही है।वेदो के रचनाकाल के संबंध में विभिन्न विद्वानो ने मत प्रस्तुत किए है                                                                                 

वेैदिक साहित्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर# sahitya in sanskrit
                                                                                   यहाँ  हम वेदो की संहिता,ब्राह्मण,आरण्यक,उपनिषद से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर लेकर आए है आप इनके अध्ययन से वैदिक साहित्य के बारें में महत्त्वपूर्ण तथ्यो को जान पायेंगे इससे पूर्व भी कुछ Post  इनके बारें में प्रकाशित कर चुके है जो आपके लिए उपयोगी है।                                                                                                 आप वैदिक साहित्य Category पर Click कर के उन्हे पढ़ सकते है।            &p;                               &nb sp;                                                                                   


ऐतरेय ब्राह्मण के रचयिता कौन है?--महीदास ऐतरेय                                                                                                                                                      

 चरैवेति चरैवेति यह प्रमुख सूक्ति संबंधित है?--ऐतरेय ब्राह्मण से                                                                                                                                          

 शतपथब्राह्मण किस वेद से सम्बन्धित है?--शुक्ल यजुर्वेद                                                                                                                                        

शतपथ ब्राह्मण के रचयिता है?--याज्ञवल्क्य                                                                                               

 गोपथ ब्राह्मण का पूर्वगोपथ में कितने  प्रपाठक है?--5प्रपाठक                                                                                                                                            

 केनेषितं पतति मन: यह वाक्य किस उपनिषद में है?--केनोपनिषद                                                                                                                                        

केनोपनिषद में मंत्र है?--34मंत्र                                                                                                              

 वेदान्त शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग कहाँ है?--मुण्डकोपनिषद में                                                                                                                                                                                                        

मुण्डकोपनिषद में अध्याय है?--3 अध्याय 6खण्ड                                                                                   

ओंकार की मार्मिक व्याख्या किस उपनिषद में वर्णित है?--माण्डूक्य उपनिषद                                                                                                                           

माण्डूक्य उपनिषद का सम्बन्ध है?--अथर्ववेद से                                                                                    

माण्डूक्य उपनिषद में कितने मंत्र है ?--द्वादश (बारह)मंत्र                                                                                                                                

"इतिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां "वेद यह सूक्ति सम्बन्धित है?--छान्दोग्योपनिषद                                                                                                          

 छान्दोग्योपनिषद किस वेद का है?--सामवेद                                                                                              

रसो वै रस: यह पंक्ति किस उपनिषद मेॆ है?--तैतिरीयोपनिषद                                                                                                                                    

   माता भूमि:पुत्र अहम् पृथिव्या :यह पंक्ति किस वेद में है?--अथर्ववेद में                                                                                                                                  

 अथर्ववेद में कितने काण्ड है?--20                                                                                                            

 सत्यकाम-जाबालि कथा,नारद सनत्कुमार 


आख्यान,इन्द्र विरोचन की कथा किस उपनिषद में है?-छान्दोग्योपनिषद                                                                                                                                 

छान्दोग्योपनिषद में अध्याय है?-8                                                                                                        

 

परा और अपरा विद्याओ का वर्णन किस उपनिषद में है?--मुण्डकोपनिषद                                                                                                                                                                                                                

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                                                                                  वेद औरवैदिक साहित्य -संहिता,ब्राह्मण,आरण्यक,उपनिषद   

मंगलवार, 25 जून 2019

वेद और वैदिक साहित्य- संहिता,ब्राह्मण,आरण्यक,उपनिषद

 संस्कृत वैदिक साहित्य  Important questions                                                                                                                                                                                                                                                  वेदत्रयी में किसकी गणना नही होती है?-- अथर्ववेद की                                                                                                                                                         अथर्ववेद की शाखाएँ कितनी है?-9                                                                                                  अथर्ववेद के देवता?--सोम                                                                                                                   वैशम्पायन महर्षि  किस वेद से सम्बन्धित है? --यजुर्वेद                                                                                                                                                              महर्षि पतंजलि के अनुसार यजुर्वेद की कितनी शाखाएँ  है?--शतम् अर्थात् सौ                                                                                                              महर्षि पतंजलि Rigveda की कितनी शाखाएँ मानते है?--एकविंशति अर्थात् इक्कीस                                                                                                              "सविता/सूर्य" देवता का सम्बन्ध  किस वेद से है?--सामवेद से                                                                                                                                  यजुर्वेद का विभाजन कितने भागों में हुआ है?--2  1.शुक्ल यजुर्वद  2.कृष्ण यजुर्वेद                                                                                                            शुक्ल यजुर्वेद की  कितनी शाखाएँ प्रचलित है?-- 2 शाखाएँ  1.वाजसनेयी  (माध्यन्दिन )  शाखा  2.काण्व शाखा                                                                                                                                              सामान्यत सामवेद की कितनी शाखाएँ है?--कुल तीन 1कौथुमीय 2.राणायनीय 3जैमिनीय                                                                                                         महर्षि पतंजलि ने सामवेद की कितनी शाखाएँ  बताई है?-एक सहस्त्र अर्थात्  एक हजार                                                                                         देवदर्श,चारणवैद्य शाखाएँ किस वेद की है?--अथर्ववेद                                                                                                                                                                     गोपथ ब्राह्मण का सम्बन्ध किस वेद से है?--अथर्ववेद                                                                                                                                                                                गोपथ ब्राह्मण मे कुल कितने अध्याय है?--11                                                                                                                                                शुक्ल यजुर्वेद का ब्राह्मण है?--शतपथ ब्राह्मण                                                                                     कृष्ण यजुर्वेद की कितनी शाखाएँ है?--4                                                                                                    किस वेद का कोई भी आरण्यक नही है?--अथर्ववेद का                                                                                                                                                Rigveda के ब्राह्मण कितने है?-- 2 1ऐतरेय ब्राह्मण 2कौषीतकि ब्राह्मण                                                                                                                                                                                                        सबसे प्राचीन आरण्यक कौनसा है?* शतपथ ब्राह्मण                                                                                               ईश,मुण्डक उपनिषद का सम्बन्ध किस वेद से है?--अथर्ववेद                                                                                                                                                  बाष्कल उपनिषद का सम्बन्ध किस वेद से है?--Rigveda                                                                             आंगिरसवेद,अथर्वांगिरसवेद,ब्रह्मवेद,क्षत्रवेद,महीवेद, भैषज्यवेद किस वेद को कहते है?--अथर्ववेद को                                                                                             पूर्वाचिक और उत्तरार्चिक रूप में किस वेद का दो प्रकार से विभाजन है?-सामवेद का पूर्वाचिक में 650 मंत्र,उत्तरार्चिक में 1225 मंत्र है                                                                                                                      सुमन्तु महर्षि का सम्बन्ध किस वेद से है?--अथर्ववेद से                                                                                                                                                                                                                                                                                                  

रविवार, 31 मार्च 2019

18 पुराणो से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण तथ्य (Puraan)

     18पुराणो से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण बिन्दु           

 नमस्कार ,पिछली Post में आप सभी को महापुराण,उपपुराण क्या है,उनकी संख्या, महापुराण के पंचलक्षण के बारे में कुछ आधारभूत जानकारी दी गई थी , उम्मीद है  आप सभी ने वह पोस्ट पढी़ होगी,अगर आपने  नही पढ़ी है तो नीचे दिये जा रहे लिंक पर Click करे । आज की पोस्ट में हम 18पुराणो से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण बिन्दुओ को जानेंगे।                                                                                                 

   महापुराण और उपपुराण  
पुरानों से संबंधित महत्वपूर्ण बिन्दु
                      पुराण (Pura  

"यस्मात् पुरा हि अनति इदं पुराणम्"  यह परिभाषा वायुपुराण में है ।                                                                


 "पुरार्थेषु आनयतीति पुराणम्"  (पूर्वतत्त्व अर्थात् प्रकृति एवं पुरुष के चिन्तन में संलग्न को पुराण कहते है।) यह परिभाषा पद्म पुराण में है।                                                                                  

"पुरा परम्परां वक्ति पुराणं तेन वै स्मृतम्" (प्राचीन  परम्परा के प्रतिपादक ग्रंथो को पुराण के नाम से जाना जाता है। यह परिभाषा वायुपुराण में है।                                                                                                                                        सभी पुराणों में प्राचीनतम पुराण ब्रह्मपुराण                                                                                                          आकार की दृष्टि से विशालतम् पुराण स्कन्द पुराण (81.000श्लोक)                                                                                                                                          
 विष्णु पुराण में पुराणो के पंच लक्षण वर्णित है।                                                                                                       महर्षि वेदव्यास ने सर्वप्रथम ब्रह्मपुराण रचा                                                                                                                  दुर्गा सप्तशती का वर्णन मार्कण्डेय पुराण में है।                                                                                                      पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड में 76 अध्याय से 81 अध्याय तक नवविधि सृष्टि का वर्णन है।                                                                                                                               नवविधि सृष्टि मुख्यत तीन सर्गो में विभक्त है। प्राकृत सर्ग , वैकृत सर्ग  ,प्राकृत-वैकृत सर्ग (उभयात्मक सर्ग)                     

 प्राकृत सर्ग की संख्या तीन है, वैकृत सर्ग की संख्या पाँच है, प्राकृत-वैकृत सर्ग (उभयात्मक सर्ग) की संख्या एक है। इस प्रकार सम्मिलित रूप में सर्ग (सृष्टि) नौ है।                                                                                                                     विष्णुपुराण के द्वितीय अध्याय में सृष्टि का संक्षिप्त वर्णन है ।                                                                                 
  विष्णु पुराण के अनुसार "अविद्या सर्ग "ब्रह्मसर्ग के अन्तर्गत है                                                                                        मत्स्य पुराण में जलप्रलय की कथा का वर्णन है।
कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने मत्स्य का रूप धारण किया था तथा जल प्रलय के समय मनु की रक्षा की।                                                                                                              नारद पुराण के अनुसार मत्स्य पुराण में 15,000 हजार श्लोक है जबकि भागवत पुराण ,ब्रह्मवैवर्त तथा स्वयं मत्स्य पुराण में श्लोक संख्या 14,000 बताई गई है।                                                                                                                            मार्कण्डेय पुराण मे देवी दुर्गा की स्तुति है। उन्हे आदि शक्ति माना गया है,इसके अतिरिक्त इन्द्र,ब्रह्मा,अग्नि,सूर्य को प्रधान देवता माना है।                                                             

 भविष्य पुराण में सृष्टि विषयक चर्चा है।इसमें भविष्य वाणी, चारों वर्णो के कर्तव्यो का वर्णन है।   श्लोक28,000 श्लोक है।                                                                                     भागवतपुराण वैष्णवों का प्रिय पुराण हैं वैष्णवी इसे पंचमवेद कहते हैं।भागवत पुराण मेंश्रीकृष्ण के जीवन का चित्रण हैं,गोपिकाओं के साथ रास लीलाओं का वर्णन है। 
इस महापुराण में 18000श्लोक है जो 12 स्कन्धो मे विभक्त है।                                                                                                                          ब्रह्माण्ड पुराण माहात्म्यो,स्तोत्रो,उपाख्यानो का संग्रह है।इसका एक अंश "अध्यात्म रामायण" है जो सात खंडों में हैं।इसमें शंकर और पार्वती के वार्तालाप का उल्लेख है।जिसमें राम भक्ति को ही मोक्ष का साधन माना गया है।                                                                                                  
  ब्रह्मवैवर्त पुराण में श्लोक संख्या अट्ठारह हजार है इस पुराण के चार भाग है ब्रह्म-भाग,प्रकृति-भाग,गणेश-भाग,कृष्ण- जन्म                                                                                           ब्रह्मपुराण इसे आदि पुराण भी कहते हैं इसमें सूर्य को शंकर का स्वरूप ही माना गया है।इसके एक परिशिष्ट को सौर पुराण के नाम से जाना जाता है।                                                                                                                            
 वराह पुराण इसमें भगवान विष्णु के वराह अवतार  का वर्णन है।इसमें शिव एवं दुर्गा से संबंधित आख्यान, नचिकेता आख्यान, श्राद्ध, प्रायश्चित आख्यान, गणेश स्तोत्र,मथुरा माहात्म्य आदि का वर्णन है।इसमें 218 अध्याय तथा 10,000 श्लोक माने जाते हैं। कही-कहीं श्लोको की संख्या 24,000 भी बताई गई है                                                                                                                                                                                        वामनपुराण में भगवान विष्णु के वामन अवतार,शंकर पार्वती के विवाह का वर्णन है। इसमें 95,अध्याय तथा 10,000 श्लोक हैं ।                                                                                                                                                                  
पुराणो में श्लोको की संख्या
पुराणो में श्लोक संख्या

 शेष 9 पुराणो की विषय सामग्री तथा अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य Next post में जानेंगे।             

शुक्रवार, 29 मार्च 2019

महापुराण और उपपुराण

 पुराण की परिभाषा :- पाणिनि के अनुसार -- पुराभवम् पुराणम्"  अर्थात् प्राचीन काल में होने वाली घटना                                                                                                  यास्क लिखते है-" पुरानवं भवति पुराणम् " अर्थात जो प्राचीन   होकर भी नवीन है वह पुराण है।                                                                                                            वायुपुराण के अनुसार "पुरा अनति पुराणम्" प्राचीन काल में जो जीवित था ,वह पुराण है।                                                                                                                                                                                                                                                                                विष्णुपुराण के अनुसार पुराणो के लक्षण इस प्रकार है                                                                             सर्गश्चविसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च ।                                                                                                                     वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम्  ।।                                                                                                                                                                                           1.सर्ग  2.विसर्ग 3.वंश  4.मन्वन्तर  5,वंशानुचरित                                                                                             सर्ग-- मूल प्रकृति में सत्व रज,तमस इन तीनो गुणो में विक्षोभ उत्पन्न होने से विविध पदार्थो की उत्पत्ति होती है यही "सर्ग" सृष्टि कहलाती है।                                                                                                                                 प्रतिसर्ग -- सृष्टि का प्रलय होना                                                                                                                                       वंश--  देवो,राजाओ,महर्षियों आदि की कुल परम्परा का क्रमबद्ध वर्णन वंश कहलाता है।                                                                                                                                                                                              मन्वन्तर-- मन्वन्तर की संख्या 14 है।मनु ,देवता,मनुपुत्र,इन्द्र,सप्तर्षि,भगवान के अंशावतार इन छ:घटनाओ के वर्णन से युक्त समय मन्वन्तर कहे गए है।                                                                                                                                                                                    वंशानुचरितं--  विभिन्न वंशो में उत्पन्न महर्षियो,राजर्षियो के चरित का वर्णन वंशक्रम से होना ही वंशानुचरित कहलाता है                                                                                                                                  इस प्रकार इन पाँचो विषयो का वर्णन पुराणो में मिलता है।                                                                                      विशेष :--श्रीमद्भागवत पुराण में पुराणों के दस लक्षण बताएँ गए है।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                              महापुराण और उपपुराण                                                                                                                   देवीभागवत में प्रथमाक्षर की समानता के आधार पर पुराणो का संख्याक्रम बताया गया है                                                                                                                                                                                                                              मद्वयं भद्वयं ब्रत्रयं वचतुष्टयम्  ।                                                                                                                     अनापलिंगकूस्कानि पुराणानि प्रचक्षते ।।                                                                                                                                                                   उक्त श्लोक के अनुसार मद्वयं का अर्थ "म" अक्षर से प्रारम्भ पुराणो की संख्या दो है , मत्स्य पुराण, मार्कण्डेय पुराण ,"भद्वय" अर्थात् भविष्य पुराण,भागवत पुराण ,ब्रत्रय अर्थात् "ब्र" प्रथमाक्षर से ब्रह्मपुराण,ब्रह्माण्ड पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण ,वचतुष्टय अर्थात्" व" प्रथमाक्षर से वायुपुराण,वामन पुराण, विष्णु पुराण,वाराह पुराण ,"अ" अक्षर से अग्नि पुराण, "न" अक्षर से नारद पुराण,"प" अक्षर से पद्मपुराण, "लिं" से लिंग पुराण, "ग" अक्षर से गरुड पुराण, "कू "से कूर्म पुराण, "स्क" से स्कन्द पुराण  इस प्रकार कुल 18पुराण है जिनको महापुराण भी कह सकते है।                                                                                                                                                                     नोट:---सर्वाधिक बृहद पुराण स्कन्दपुराण है(81000श्लोक )                                                                    सर्वाधिक लघु पुराण मार्कण्डेय पुराण है(8000श्लोक)                                                                                                                                                                                                                           उपरोक्त 18 पुराणो के अतिरिक्त गरुड पुराण में 18 उपपुराण वर्णित है जो इस प्रकार है 1 सनत्कुमार 2 नारसिंह  3 स्कान्द 4 शिवधर्म 5 आश्चर्य  6 नारदीय 7 कपिल 8 कालिका  9 वामन 10 वारुण  11औशनस  12 ब्रह्माण्ड 13 माहेश्वर 14 पाराशर 15 साम्ब  16 सौर  17.मारीच  18 भार्गव                                                                                               पद्म पुराण मे सत्व रज तम गुणो के आधार पर पुराणो का विभाजन किया गया है।                                                                                                                                 

सत्व आधारित (विष्णु सम्बद्ध) विष्णु - नारद-भागवत-गरुड-पद्म-वराह पुराण( 6 पुराण)                                                                                                                     राजसिक पुराण (ब्रह्म सम्बद्घ)ब्रह्माण्ड,          ब्रह्म,ब्रह्मवैवर्त,मार्कण्डेय, भविष्य ,वामन (6पुराण )                                                                                                              तामस पुराण (शिव सम्बद्ध) शिव- लिंग-स्कन्द-अग्नि- मत्स्य,कूर्म पुराण (6पुराण)