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सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

तर्कभाषा#षड्विध सन्निकर्ष#न्याय दर्शन

प्रश्न१ प्रत्यक्ष प्रमाण किसे कहते है?

"तत्र प्रत्यक्षज्ञानकरणं प्रत्यक्षम्" प्रत्यक्ष ज्ञान या प्रमा का जो असाधारण कारण है वह ही प्रत्यक्ष प्रमाण है।

प्रश्न२ अब प्रश्न उठता है कि प्रत्यक्ष प्रमा क्या है?

"इन्द्रियार्थ सन्निकर्षजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षम्" अपने विषय के साथ इन्द्रियों का सामीप्य संबंध होने पर उससे जो ज्ञान उत्पन्न होता है।वह प्रत्यक्ष कहलाता है।

प्रत्यक्ष प्रमा के दो भेद है-

निर्विकल्पक ज्ञान

सविकल्पक ज्ञान

प्रत्यक्ष ज्ञान(प्रमा) का कारण इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष( इन्द्रियो का अपने विषयो से संयोग अर्थात समीपता) है।

प्रश्न३  इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष कितने प्रकार का है?

इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष के छः भेद है

1.संयोग सन्निकर्ष= जब इन्द्रिय का किसी वस्तु से संयोग होता है तो उसे संयोग सन्निकर्ष होता है।जैसे आँख द्वारा घडे़ को देखना

2.संयुक्त समवाय=जब आँख द्वारा घडे़ का ज्ञान होता है उसके पश्चात उसमे शुक्ल,रक्त,पीत जैसे रंग का भी ज्ञान होता है तो वहाँ संयुक्त समवाय होता है।

संयुक्त समवाय में वस्तु के गुणो का प्रत्यक्ष होता है।

3.संयुक्त समवेत समवाय- जब वस्तु  से संयोग होने पर उसकी जाति का बोध होता है तो वहाँ संयुक्त समवाय होता है। जैसै घडे़ में शुक्लत्व,लालत्व,पीतत्व का बोध होना।

4.समवाय =श्रोत्रेन्द्रिय(कान) से शब्द का ज्ञान 

5.समवेत समवाय=श्रोत्रेन्द्रिय(कान) से शब्द की जाति शब्दत्व का बोध होना

6.विशेषण-विशेष्य= किसी भूतल पर घडे़ का अभाव होना विशेषण-विशेष्य भाव सन्निकर्ष है। यहाँ" घडे़ का अभाव" विशेषण है  " भूतल "विशेष है।


निष्कर्ष= उक्त षड्विध(छः प्रकार)का सन्निकर्ष प्रत्यक्ष प्रमा के आधार है।

यथार्थ अनुभव और अयथार्थ अनुभव

तर्कभाषा #केशवमिश्र#तर्क भाषा के महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर


शनिवार, 30 जनवरी 2021

तर्कभाषा#केशवमिश्र की तर्कभाषा#न्याय दर्शन#अनुभव के भेद

 अनुभव= स्मृति से भिन्न ज्ञान अनुभव कहलाता है।

 स्मृति भावना पर आधारित होती है जबकि अनुभव नामक ज्ञान स्मरण से भिन्न होता है किसी वस्तु को देखकर होने वाला मानसिक व्यापार बुद्धि का विषय होने पर अनुभव कहलाता है ।

अनुभव के दो भेद है 

यथार्थ अनुभव और  अयथार्थ अनुभव


यथार्थानुभव = जो वस्तु जैसी है उसका वैसा ही ज्ञान प्राप्त होना "यथार्थ अनुभव" कहलाता है। जैसेचांदी को देखकर चांदी का ज्ञान प्राप्त होना।


 यथार्थ अनुभव के चार उपभेद है। 

1.प्रत्यक्ष, 2.अनुमिति 3.उपमिति 4.शाब्द

 इन चारों के आधार पर प्रमाण भी चार माने गए हैं 1.प्रत्यक्ष प्रमाण 2अनुमान प्रमाण3. उपमान प्रमाण 4. शब्द प्रमाण 


आइए हम यथार्थ अनुभव के चारों उपभेदों के बारे में जान लेते हैं

 प्रत्यक्ष यथार्थ अनुभव= प्रत्येक इंद्रिय का उसके विषय से साक्षात् संबंध होने पर जो ज्ञान प्राप्त होता है वह यथार्थ अनुभव प्रत्यक्ष कहलाता है जैसे घड़े को आंख से देखने पर यह घड़ा है इस प्रकार का ज्ञान होना प्रत्यक्ष यथार्थ अनुभव है। 

अनुमति यथार्थ अनुभव= अनु अर्थात बाद में अर्थातप्रत्यक्ष ज्ञान के पश्चात होने वाला ज्ञान। प्रत्यक्षसे भिन्न कारण को देखकर कार्य का अथवा कार्य को देखकर कारण का अनुमान कर लेना अनुमति यथार्थ अनुभव है।  जैसे सुबह उठने पर चारों ओर पानी देखने पर रात्रि में वर्षा होने का अनुमान यही 'अनुमिति" है

 उपमिति यथार्थ अनुभव= किसी वस्तु या व्यक्ति का किसी दूसरे वस्तु या व्यक्ति से कुछ समानता होने पर किसी नवीन वस्तु का ज्ञान होना "उपमिति" नामक यथार्थ अनुभव कहलाता है।

जैसे गो के समान गवय होता है  किसी व्यक्ति के कहने पर जब कोई गवय(नील गाय) से अपरिचित व्यक्ति  गो(गाय)से समानता रखने वाले  किसी किसी पशु को देखता है तो उसे अच्छा यही गवय (नील गाय)है इस प्रकार का नवीन ज्ञान प्राप्त होता है। यही"उपमिति" है

शब्द यथार्थअनुभव=  शब्द से प्रतीत यथार्थ ज्ञान "शाब्द" नामक यथार्थ अनुभव कहलाता है


आगे अयथार्थ अनुभव और उसके उपभेदों के बारे में जानते हैं।

 अयथार्थ अनुभव  जो वस्तु जैसी नहीं है फिर भी उसका वैसे ही रूप में मानना समझना अर्थात वास्तविकता से भिन्नअवास्तविक ज्ञान"अयथार्थ अनुभव" कहलाता है 

अयथार्थ अनुभव तीन प्रकार का होता है।

संशय, विपर्ययऔर तर्क


संशय =किसी एक वस्तु में परस्पर विरुद्ध अनेक धर्मों के संबंध का ज्ञान 

  जैसे किसी सूखे ठूंठ वृक्ष को देखकर यह ठूँठ है या मनुष्य इस प्रकार का संशय युक्त ज्ञान प्राप्त होता है।

 विपर्यय= वास्तविकता से रहित है अवास्तविक  मिथ्या ज्ञान अर्थात जो जैसा नहीं है उसका भी वैसा ज्ञान होना ।

 जैसे सर्प को रस्सी समझ लेना।

तर्क=व्याप्य के आरोप से व्यापक का आरोप करना

जैसे यदि पर्वत में आग न हो तो धुआँ भी नहीं होगा इसमे अग्नि के अभाव रूप व्याप्य आरोप (मिथ्याज्ञान) से धूम अभाव रूप व्यापक का आरोप (मिथ्याज्ञान)है। 


संक्षेप में इस प्रकार अनुभव के दो भेद है

 यथार्थ अनुभव और यथार्थ अनुभव 

 यथार्थ अनुभव के पुनः चार भेद है

 प्रत्यक्ष, अनुमति उपमिति और शाब्द

अयथार्थ अनुभव के पुनः तीन भेद है

 संशय,विपर्यय और तर्क


धन्यवाद दोस्तों, उम्मीद है कि आप सभी का सहयोग आगे भी मिलता रहेगा।

तर्कभाषा के महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

संस्कृत साहित्य के 50 महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर


  

तर्कभाषाTarkbhasha केशवमिश्र#न्यायदर्शन

1. सांख्यतत्वकौमदी कस्य रचनाऽस्ति?

-वाचस्पति मिश्रस्य

2.तर्ककौमुद्या रचनाकार:?

-लौगाक्षिभास्करः

3.न्यायसूत्रषु कस्य खण्डनं क्रियते?

-शून्यवादस्य

4.न्यायः ईश्वरं कथितवान?

-परमात्मा

5.गौतमस्य अपरनामः?

-अक्षपादः

6.तर्कभाषाया:रचयिता कः?

-केशवमिश्रः

7.ज्ञातविषयं ज्ञानं.....?

-स्मृतिः

8.संस्कारमात्रजन्यं ज्ञानं काः?

-स्मृतिः

9.स्मृतिव्यतिरिक्तं ज्ञानं किम्?

-अनुभवः 

10.किम् अनुमानं?

-लिड्गपरामर्शोऽनुमानम्

11अनुमानं कतिविधम्?

-द्विविधम(स्वार्थानुमानं,परार्थानुमानं)

12.अनुमानस्याधारोऽस्ति?

-व्याप्तिसम्बन्धः

13.व्याप्तिरस्ति?

-विशिष्टसम्बधः

14.न्यायदर्शने पदार्थानां सड्ख्यास्ति?

षोडश:

15.कतिद्रव्यानि?

नव

16.पृथिवी कतिधा?

-द्विधा(नित्या,अनित्या)

17.नित्या पृथिवी का?

-परमाणुरूपा

18.अनित्या पृथिवी का?

-कार्यंरूपा

19.का पृथिवी?

-गन्धवती

20रूपरहितस्पर्शवान् कः?

-वायुः

21वायुः कतिविधः?

-द्विविधः

22शब्दगुणकम् किम्?

आकाशम्

23 सामान्यं कतिविधम्?

-द्विविधम्(परम्,अपरम्) 

24.कति विशेषः?

-अनन्तः

25.समवायः कतिविधः

-1

26.अभावः कतिविधः

-पञ्चविधः

27भावभिन्नत्वं..........?

-अभावः

28.प्राचीन न्याय परम्पराकथ्यते?

-पदार्थमीमांसात्मकः

29.नव्यन्यायधारा कथ्यते?

-प्रमाणमीमांसात्मकः

30.न्यायसूत्राणां भाष्यकारोऽस्ति?

-वात्स्यायनः


ये थे तर्कभाषा से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न जो first grad,collage lecturer#net/set  परीक्षाओं में पूछे जाते हैं। आगे भी तर्कभाषा से संबंधित कुछ परीक्षोपयोगी जानकारी प्रदान करने का प्रयास किया जाएगा। 

धन्यवाद✍️

विशेष पोस्ट

तर्कसंग्रह के महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

तर्कसंग्रह के अनुसार९(9)द्रव्य कौनसे है।

तर्कसंग्रह के अनुसार कारण और उसके भेद










मंगलवार, 17 मार्च 2020

Net#set#jrf sanskrit exam#charvak darshan#चार्वाक दर्शन

लोकायत दर्शन#चार्वाक दर्शन#बार्हस्पति  दर्शन से सम्बन्धित तथ्य
चार्वाक दर्शन के संस्थापक बृहस्पति माने जाते हैं इसलिए इसे बार्हस्पति दर्शन भी कहते है।

इसी का प्राचीन नाम लोकायत दर्शन है।

चार्वाक दर्शन सुख को ही जीवन का परम उद्देश्य मानता है।

 यह भौतिकता वादी दर्शन है जो वेदों की निंदा करता है।

यह अग्निहोत्र और श्राद्ध का निषेध करता है

चार्वाक दर्शन की दृष्टि में प्रत्यक्ष ही एकमात्र प्रमाण है।

चार्वाक दर्शन  ईश्वर और आत्मा का निषेध मानता है।

चार्वाक दर्शन काम को ही एकमात्र पुरुषार्थ मानता है

 चार्वाक दर्शन की दृष्टि में मृत्यु ही मोक्ष है।

चार्वाक दर्शन चार तत्वों को मानता है।👉 पृथ्वी जल तेज वायु

यह आकाश को तत्व नहीं मानता है।

चार्वाक दर्शन के सिद्धान्त
 प्रत्यक्ष प्रमाणवाद- चार्वाक दर्शन प्रत्यक्ष दिखाई देने वाली वस्तुओं को ही अंतिम सत्य मानता है यह अनुमान शब्द आदि प्रमाणो को नहीं मानता है।

 भौतिकतावा   - यह सांसारिक वस्तुओं को अत्यधिक महत्व देता है

भूत चैतन्य वाद  - पृथ्वी जल तेज वायु  इन 4 महा भूतों के सहयोग से ही शरीर में चेतनता उत्पन्न होती है यह कोई अलौकिक वस्तु नहीं है


ऐहिकसुखवाद- चार्वाक दर्शन  पृथ्वीलोक के सुख को ही महत्व देता है इसके अनुसार जो कुछ है वह इसी  पृथ्वी पर है इसलिए व्यक्ति को जब तक जीवित है  सुख पूर्वक रहना चाहिए इस संबंध में कहा भी गया है जब तक जियो सुख पूर्वक जियो   चाहे इसके लिए  किसी व्यक्ति से ऋण भी लेना पड़े तो संकोच नहीं करना चाहिए क्योंकि यह मानव जीवन फिर हमें नहीं मिलेगा। इसलिए जब तक रहो सुख पूर्वक रहो 

यावजीवेत् सुखम् जीवेत् ऋणम् कृत्वा घृतं पिबेद्
विशेष -
चार्वाक दर्शन,जैन दर्शन,बौद्धदर्शन ये तीनों नास्तिक दर्शन माने जाते हैं।

 चार्वाक दर्शन अवैदिक दर्शन में प्राचीनतम दर्शन है।

 यदि आप सभी को यह पोस्ट ज्ञानवर्धक लगे तो अपने दोस्तों के साथ शेयर करना ना भूले ताकि उन्हे भी परीक्षा की तैयारी में मदद मिले


बुधवार, 8 जनवरी 2020

सांख्यदर्शन#सांख्यकारिका के महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर#सत्कार्यवाद क्या है

  सांख्यदर्शन#सांख्यकारिका के महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर      


1.सांख्य दर्शन के प्रवर्तक है ?
महर्षि कपिल


/> 2.सांख्यकारिका पर सांख्यकौमुदी टीका किसने लिखी वाचस्पति मिश्र ने

सांख्य दर्शन के अनुसार दुख कितने प्रकार का है?
 तीन प्रकार
आदिदैविक, आदिभौतिक और आध्यात्मिक

3.सांख्य दर्शन में अशक्ति के कितने भेद  बताए हैं?
 28
सांख्य दर्शन द्वैतवादी है।

4.सांख्य दर्शन के अनुसार अपवर्ग (मोक्ष) का कारण क्या है?   विवेक

5.सांख्य दर्शन के अनुसार बंधन का कारण है?
अविवेक
/> 6.सांख्य दर्शन के अनुसार कितने प्रमाण हैं?
3
1.प्रत्यक्ष प्रमाण 2. अनुमान प्रमाण 3. शब्द प्रमाण
  सांख्य दर्शन उपमान  प्रमाण को नहीं मानता है

7.पंचमहाभूतो की प्रकृति है ?
 अहंकार

8.अहंकार की प्रकृति है?
 महत्त् (बद्धि)


प्रकृतेर्महांस्ततो अहंकारतस्माद् गणश्च षोड़शक: ।  

तस्मादपि षोड़शकात्पञ्चभ्य:पञ्च भूतानि ।

उपर्युक्त श्लोक के अनुसार मूल प्रकृति से  महत् ,महत् से अहंकार ,अहंकार से सोलह तत्वों का समूह है( एकादश इंद्रियां और पांच तन्मात्राएं ) पांच तन्मात्राओ से पंचमहाभूत उत्पन्न हुए है।

 9.सांख्य दर्शन के अनुसार सत्व रज और तम गुणों की साम्यवस्था कहलाती है?
मूल प्रकृति

10.सांख्य दर्शन के अनुसार त्रिगुणात्मक, अविवेकी, विषय ,सामान्य  प्रसवधर्मिता  किसके गुण है?
मूल प्रकृति के
प्रसवधर्मिता का अर्थ  =उत्पन्न करने की क्षमता 

11.प्रकृति आत्मा को कितने रूपों के द्वारा बांधती है
7 रूपों के द्वारा
   
12.आप्तवाक्यं वाक्यम किम् ? शब्द:

13.लघुऔर प्रकाशक यह किस गुण की विशेषता है?
 सत्व गुण  की

सत्व गुण  रजोगुण और तमोगुण के संबंध में निम्न श्लोक द्ष्टव्य है?
/>

सत्वं लघु प्रकाशकमिष्टमुपष्टम्भकं चलञ्च रज: ।    

गुरु वरणकमेव तम,प्रदीपवच्चार्थतो वृति:।।उपर्युक्त श्लोक के अनुसार सत्व गुण लघु और प्रकाशित करने वाला है, रजोगुण उपस्टम्भक और  अस्थिर स्वभाव वाला होता है, तमोगुण भारी और सत्य और असत्य पर आवरण डालने वाला होता है 

निष्कर्ष= सांख्यकारिका सांख्य दर्शन का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है जिसके रचयिता ईश्वर कृष्ण है।सांख्य दर्शन में कुल 25 तत्व कुल माने गए हैं जो इस सृष्टि की उत्पत्ति में सहायक है।


 दोस्तों सांख्य दर्शन टॉपिक बहुत महत्वपूर्ण है संस्कृत की प्रतियोगी परीक्षाओंं जैसेFirst grade#Net#Set मे इससे एक से अधिक प्रश्न पूछे जाते हैं। नीचे दिए गए links पर क्लिक करके भी आप इसके संबंध में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। 

सोमवार, 25 नवंबर 2019

तर्कसंग्रह (Tarksangrah) के महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर# तर्कसंग्रह के अनुसार पदार्थ के 24 गुण


तर्कसंग्रह (Tarksangrah) के महत्वपूर्ण प्रश्न -उत्तर #rpsc#net#set exams                                                    

   1.अतीतादि व्यवहार हेतु : ?  
काल:

2.ज्ञानाऽधिकरण .....?
आत्मा 

3.आत्मा के कितने भेद है?
 दो ,1.जीवात्मा2. परमात्मा ।

4.मन का लक्षण क्या है?
 सखाद्युपलब्धिसाधनमिन्द्रियं मनः (सुख और दुख की ज्ञान कराने वाली इंद्रिय मन है) 

 5.तर्कसंग्रह के अनुसार गुण पदार्थ के कितने भेद हैं? 
span style="font-size: large;"> 24   

6. " गुण "का वह भेद जिसका ज्ञान केवल चक्षु से होता है?
रूप



7."रूप " नामक गुण के कितने प्रकार होते हैं?
सात 
शुक्ल ,नील, पीत ,रक्त, हरित, कपीश, चित्र 

8. शुक्ल रूप के कितने भेद हैं?
 दो ,अभास्वर शुक्ल और भास्वर शुक्ल 
Note: रूप रूप की सत्ता पृथ्वी, जल, तेज में रहती है वायु में नहीं

9. रस के कितने भेद है?
 6 
 मधुर, अम्ल,लवण, कटु, कषाय, तिक्त 

10.एकत्वादिव्यवहारहेतु:...?
संख्या 
नोट: यह सभी नौ प्रकार के द्रव्यों में पाई जाती है 

11.मानवव्यवहाराऽसाधारण कारणं.....?
परिमाण

12. परत्व के कितने भेद है? 
दो पहला दिक्कॄत परत्व, दूसरा कालकृत परत्व  



13.द्रव्य के कितने भेद हैं 
दो  1. सांसिद्धकं  2. नैमितिकं

14.श्रोत्रग्राह्य गुण:....?
शब्द:

15. "शब्द "नामक गुण के कितने भेद हैं?
 दो 
1.ध्वन्यात्मक  2.वर्णनात्मक 
/> वह ध्वनि जो किसी धातु से बने पदार्थ पर चोट करने या रगड़से उत्पन्न होती है वह "ध्वन्यातमक" तथा कंठ से उचारित वर्णादि "वर्णात्मक "होती है। 

tarksngrah से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिए आप** दर्शनशास्त्र **लेबल पर क्लिक कर उन्हें पढ़ सकते हैंं

गुरुवार, 7 नवंबर 2019

तर्कसंग्रह के अनुसार नौ(9)द्रव्य कौनसे है?-उनके गुण क्या है?

/>  नमस्कार आप सभी का स्वागत है Sanskrit jeeva पर आज हम  न्याय वैशेषिक दर्शन पर आधारित ग्रंथ तर्कसंग्रह से सम्बन्धित चर्चा कर रहे है
दोस्तो जैसा कि आप सभी को विदित है कि तर्कसंग्रह के रचनाकार अन्नमभट्ट है इसी ग्रंथ से सम्बन्धित कुछ पोस्टे पूर्व में लिखी जा चुकी है जिन्हे आपनीचे दिए जा रहे लिंक पर Click कर के पढ़ सकते हैं

तर्कसंग्रह -अन्नमभट्ट प्रणीत ग्रंथ/न्याय वैशेषिक दर्शन         
  न्याय वैशेषिक दर्शन में सात(7)  पदार्थ माने गए हैं। 1द्रव्य,2 गुण 3कर्म, 4 सामान्य, 5 विशेष, 6समवाय 7अभाव
 आइये हम  इस पोस्ट के अंदर नौ द्रव्यो के बारे में जान लेते है 
तर्कसंग्रह (न्याय वैशेषिक दर्शन) के अनुसार सात पदार्थ
तर्कसंग्रह (न्याय वैशेषिक दर्शन) के अनुसार सात पदार्थ


तर्कसंग्रह के अनुसार नौ द्रव्य और उनके लक्षण
(गुण)
पृथिवी-- गन्धवती पृथिवी तर्कसंग्रह के अनुसार नौ द्रव्यों में पृथिवी की गणना होती हैपृथिवी में गंध का गुण होता है। गंधत्व  पृथ्वी का सामान्य लक्षण है
 पृथ्वी के दो भेद होते हैं 1.नित्य पृथिवी 2.अनित्य पृथिवी
नित्य पृथिवी परमाणुरुप में होती है क्योंकि परमाणु का कभी विनाश नही होता है अनित्य पृथ्वी कार्यरूप है  क्योकि कार्य हमेशा नही रहता है।
अनित्य पृथ्वी के पुनः तीन भेद किए गए  ।
> 1शरीररूप,2 इंद्रिय रूप और 3विषय रूप 
हमारा शरीर  शरीर रूप पृथ्वी है इसी तरह नाक केअग्र भाग में रहने वाला घ्राणेन्द्रिय इन्द्रिय रूप पृथ्वी है और मिट्टी पत्थर आदि विषयरूप पृथ्वी है अर्थात अनित्य पृथ्वी शरीर ,इन्द्रिय और विषय के रूप में रहती है।

जल तर्कसंग्रह में जो नौ द्रव्य बताए गए हैं उनमें जल नामक पदार्थ की भी गणना की गई है।जिसमें "शीतलता स्पर्श "नामक गुण समवाय संबंध से रहता है वह जल है 
प्रथम तो जल के भी दो भेद किये गये हैं 1नित्य,2अनित्य 
अनित्य जल को पुनः तीन भागों में विभक्त किया गया है।1. शरीर रूप 2 इन्द्रिय  रूप 3 विषय रूप शरीर रूप में यह वरूण लोक में रहता है ऐसा पुराणो में वर्णित है।  जीभ के अग्रभाग में विद्यमान रसनेन्द्रिय इन्द्रिय के रूप में पाये जाने वाला जल का भेद  है ,नदी नाले समुद्र में रहने वाला जल विषय रूप है 

तेज(अग्नि)-तर्क संग्रह के अनुसार नौ द्रव्यो में तेज की गणना होती है इसका सामान्य लक्षण है "उष्णस्पर्शवत्तेज" जिसका स्पर्श उष्ण(गर्म) होता है। जैसे अग्नि,चन्द्र,सूर्य आदि क्योकि इनमे तेज समवाय सम्बन्ध से रहता है। यह नित्य और अनित्य दो प्रकार का है नित्य तेज परमाणुरूप और अनित्य तेज कार्यरूप होता है। यह भी अनित्य रूप में शरीर, इन्द्रिय,और विषय केभेद से पुन:तीन प्रकार का होता है।
तर्कसंग्रह के अनुसार तेज के लक्षण और भेद
विषयरूप तेज के चार प्रकार

span style="background-color: lime; font-size: large;">विषय रूप अग्नि के भी चार प्रकार बताए गए है।1भौम तेज2 दिव्य तेज3औदर्य तेज 4 आकरज तेज


वायु - रूप रहित,और स्पर्शवान होती है  इसका कोईरूप नही है,लेकिन इसे त्वचा इन्द्रिय से महसूस कर सकते है

 वायु के दो भेद है नित्य और अनित्य है।नित्य  वायु परमाणु रूप होती है  अनित्य वायु  

 अनित्य वायु के पुन:तीन भेद है शरीर रूप में वायु वरूणलोक में रहता है जैसा कि पुराणादि में वर्णित है  इंद्रिय रूप में हमारी चमडी (त्वचा) के रूप में,विषय रूप में आंधी तूफान चक्रवात तथा हमारे शरीर में रहने वाले प्राणवायु है  हमारे विभिन्न प्रकार की क्रिया को करने के कारण एवं विभिन्न स्थानों में रहने के कारण यह प्राणवायु पांच प्रकार की होती है प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान


आकाश-तर्क संग्रह में बताए गए नौ द्रव्यों में आकाश भी सम्मिलित हैइसमें "शब्द गुण" समवाय संबंध से रहता हैआकाश एक और व्यापक है जबकि पृथ्वी आदि महाभूतों में अनेकत्व और अव्यापकत्व दिखाई देता है। आकाश नित्य है, अनित्य नहीं है

काल-  नौ द्रव्यो में छठवां तत्व काल हैंजो किसी वस्तु के अतीत,वर्तमान,भविष्य के ज्ञान  का कारण है  आकाश के सामान सर्वत्र रहने से एवं सभी पदार्थों में व्यवहार का कारण होने से व्यापक एवम् नित्य है।लौकिक व्यवहार में हम क्षण, घड़ी, दिन, रात, पक्ष ,मास, बर्ष आदि काल के अनेक भेदो का प्रयोग करते हैं परन्तु व्यवहार हेतु का एक मात्र आधार होने से कारण एक ही माना गया है,और नित्य हैं 

दिक्(दिशा)- प्राची, प्रतीची, वाची, उदीची आदि को जानने का जो एक मात्र कारण हैजिसके बिनाका प्राच्यादि का बोध नहीं हो सकता ऐसे असाधारण कारक को दिशा कहते हैं यह व्यापक और नित्य हैंदिशा आदि की जो दस भेद बताए जाते हैं वह केवल  औपाधिक  हैवस्तुत दिशा एक ही है एक होने के कारण वह व्यापक है।


   आत्मा- आत्मा भी नौ द्रव्यो में गिना जाने वाला एक द्रव्य है   जो ज्ञान का अधिकरण है अर्थात जो ज्ञान का आश्रय तत्व है,जिसमें चेतना विद्यमान हो वही आत्मा है न्याय शास्त्रियों के अनुसार आत्मा के दो भेद बताई गई है1 परमात्मा 2 जीवात्मा 
परमात्मा वह है जो सब कुछ जानता है  
 जीवात्मा - जीवात्मा भी परमात्मा का ही अंश है, जो सब कुछ नहीं जानता परंतु बहुत कुछ अवश्य जानता है प्रत्येक शरीर में विद्यमान होने से यह अनंत माना गया है जीवात्मा और प्राणी पर्यायवाची हैं।यह प्रत्येक शरीर में विद्यमान होने के कारण व्यापक हैऔर व्यापक होने के कारण नित्य भी हैं।

मन सुख और दु:ख की प्राप्ति का जो इन्द्रिय के रूप में साधन /माध्यम है।वह इन्द्रिय ही मन है। मन प्रत्येक शरीर में स्थित होने से अलग अलग अनन्त है वह परमाणुरूप और नित्य है।

शनिवार, 2 नवंबर 2019

तर्कसंग्रह के अनुसार कारण और उसके भेद#Tarksangrah- net/set/collage lecturer/first grade exams#rpsc sanskrit exams

तर्क संग्रह के अनुसार कारण और उसके भेद 
तर्क संग्रह के अनुसार कारण और उसके भेद/Tarksangrah-net/set/collage lecturer all sanskrit examsurer
तर्कसंग्रह के अनुसार कारण और उसके भेद

रविवार, 17 मार्च 2019

तर्कसंग्रह (Tarksangrah) -अन्नंभट्ट प्रणीत

  तर्कसंग्रह  (वैशेषिक दर्शन )                                                                                                                                                                         "तर्कसंग्रह" "न्याय वैशेषिक" दर्शन पर आधारित ग्रंथ है ।बैशेषिक दर्शन के प्रणेता महर्षि कणाद है वैशेषिक दर्शन में विशेष तत्व को महत्त्व दिया गया है वैशेषिक दर्शन पर अनेक टीकाए लिखी गई ।फिर वैशेषिक को न्याय दर्शन में मिला दिया गया जिससे यह न्याय वैशेषिक दर्शन कहलाया।                                                                                                                                                          वैशेषिक दर्शन  के 7 पदार्थ ** वैशेषिक दर्शन में पदार्थो की संख्या 7मानी गई है। जिनका वर्णन तर्कसंग्रह ग्रंथ में हुआ है। 
वैशेषिक दर्शन के अनुसार 7  पदार्थ With image

पदा र्थ का अर्थ*पद का शाब्दिक अर्थ है  "पदस्य अर्थ:"  अर्थात् पद का अर्थ । विभिन्न वैशेषिक ग्रंथो में पदार्थ के सम्बन्ध में कहा गया है।जो ज्ञेय है, वही पदार्थ है।जो प्रमा का विषय है, वह पदार्थ है।जिसे नाम दिया जा सके ,वह पदार्थ है।                                                                                                                                                                                                              वैशेषिक दर्शन के अनुसार 7पदार्थ निम्न बताए है।                                                                                                                                                                                                            " तत्र द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाभाव: सप्त" पदार्था:                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                       1द्रव्य 2.गुण 3.कर्म 4.सामान्य 5.विशेष 6.समवाय 7.अभाव                                                                     

द्रव्य ** सात पदार्थों में द्रव्य प्रथम पदार्थ है  द्रव्य, गुण और कर्मो के आधार होते है                                                                                          द्रव्य नौ है आकाश वायु, जल, अग्नि पृथिवी,काल,दिक् आत्मा,मन                                                                                                                                                                         गुण -ये सभी द्रव्यो में पाये जाते है लेकिन ये द्रव्य और कर्मो से भिन्न होते है। गुण का लक्षण है-"द्रव्यकर्मभिन्नत्वे सति सामान्यत्वं गुणसामान्यलक्षणम्"                                                                                                      रूप,रस,गंध,स्पर्श,संख्या,परिमाण,पृथकत्व,संयोग,विभाग,परत्व,अपरत्व,गुरुत्व,द्रवत्व,स्नेह,शब्द,बुद्धि,सुख,दुख,  इच्छा,द्वेष,प्रयत्न,धर्म,अधर्म और संस्कार ये कुल चौबीस गुण होते है।                                                                                                                                  कर्म--" संयोगभिन्नत्वे सति संयोगा असमवायिकारणत्वं कर्मत्वं" अर्थात संयोग नामक गुण से भिन्न होने पर भी जो संयोग का असमवायिकारणहै, वह कर्म कहलाता है। गुण के समान कर्म भी द्रव्य पर आश्रित रहने वाला धर्म है। लेकिन यह गुण से भिन्न भी है। कर्म केवल मूर्त द्रव्यो में ही रहता है,विभु द्र्व्यों मे नही                                                                                                                कर्म पाँच प्रकार के है-1उत्क्षेपण (ऊपर की ओर फेंकना) 2.अवक्षेपण(नीचे की ओर फेंकना 3.आकुञ्चन (सिकोड़ना) 4प्रसारण (फैलना) 5गमन (चलना)                                                                                    सामान्य-- "सामान्यं जातिरपि उच्यते"सामान्य को जाति कहते है , यह नित्य,एक और अनेकानुगत होता है।उदाहरण के लिए मनुष्यत्व ,जो मनुष्यो की जाति है  इसमें मनुष्य जाति के सभी सदस्य शामिल है।                                                                                             सामान्य के दो भेद है पर सामान्य, अपर सामान्य                                                                                                                                           परसामान्य- परसामान्य अत्यधिक व्यापक सामान्य को कहते हैं जैसे सत्ता                                                                                                                                                                                                                      अपरसामान्य कम व्यापक होता है जैसे मनुष्यत्व                                                                                                                                                                                                                   विशेष**नित्य द्रव्यो में रहने वाला विशेष "अनन्त "होता है।साधारण अवयव पदार्थों में विशेष नहीं होता । सामान्य से तो जाति तथा अभेद सम्बन्ध का ज्ञान होता है।जबकि विशेष व्यक्ति तथा भेद संबंध का ज्ञान कराता है।                                                                                            समवाय-  "नित्य सम्बन्धत्वं समवाय लक्षणम्"  दो वस्तुओं के मध्य के अविच्छेद,स्थायी सम्बन्ध ही समवाय है यह दो वस्तुओ को परस्पर बाँधे रखता है।जैसे मिट्टी और घडे़ का सम्बन्ध ,चीनी और मिठास का सम्बन्ध यहां ध्यान रखने की बात यह है कि समवाय संबंध संयोग से भिन्न होता है संयोग तो अनित्य तथा बाह्य सम्बन्ध है जबकि समवाय नित्य तथा आंतरिक सम्बन्ध है ।                                                                                            अभाव--  "प्रतियोगिनाअधीनज्ञानविषयत्वम् अभावत्वम् "अर्थात भाव से भिन्न अथवा प्रतियोगी ज्ञान के अधीन ज्ञान के विषय को अभाव कहते हैं सामान्य शब्दों में किसी स्थान विशेष और काल विशेष में किसी वस्तु की अनुपस्थिति होना अभाव है।                                                                                                                    अभाव के चार प्रकार--   प्रागभाव , प्रध्वंसाभाव, अत्यन्ताभाव,अन्योन्याभाव                                                                                                                           प्रागभाव-*किसी वस्तु की उत्पत्ति के पूर्व कारण में उस वस्तु का अभाव प्रागभाव है जैसे मिट्टी में घड़े का अभाव घटअपनी उत्पत्ति से पूर्व अपने कारण मिट्टी में अनुपस्थित रहता है यही प्रागभाव है यह अनादि किंतु सान्त होता हैअर्थात इस अभाव का प्रारंभ नहीं है लेकिन अंत हो सकता है                                                                                                                                                                                                                    प्रध्वंसाभाव**कार्य की उत्पत्ति के बाद वस्तु का अभाव होना जैसे घड़े के निर्माण के बाद घड़े का अभाव ,कुर्सी के नष्ट हो जाने पर उसका अभाव।यह अभाव आदि किन्तु अनंत होता है।                                                                                                                                     अत्यन्ताभाव**दो वस्तुओं के मध्य पूर्ण अथवा त्रैकालिक अभाव  अत्यन्ताभाव कहलाता है  जैसे अग्नि में गंध का अभाव क्योंकि गंध अग्नि का गुण नहीं है अपितु पृथ्वी का गुण हैअतः अग्नि में गंध हमेशा अनुपस्थित रहती है।                                                                                                                                     अन्योन्याभाव**दो वस्तुओ के मध्य तादात्म्य संबंध का अभाव जैसे मेज कुर्सी नहीं है, घट पट नहीं है                  मेज कुर्सी नहीं है इस उदाहरण में मेज और कुर्सी दो भिन्न वस्तुएं हैं ।घडा़ वस्त्र नही हो सकता है। इसलिए ये दोनों उदाहरण अन्योन्याभाव के है।                                                                                                                                                                                                     इस प्रकार उपरोक्त 7 पदार्थ वैशेषिक दर्शन के है।                                                                                           

रविवार, 17 फ़रवरी 2019

vedantsaar (वेदान्तसार 25 important questions for net exam

href="https://drive.google.com/file/d/1HA318UDEFz3XE_HGq7olSeb70vtXK2zZ/view?usp=drivesdk" target="_blank dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on">  वेदांतसार के अनुसार अनुबंध कितने हैं?-चार                                                                                                      वेदांत शास्त्र के अनुसार सच्चिदानंद ब्रह्म है ?-वस्तु                                                                                                वेदांत शास्त्र में अज्ञान जनित जगत को कहा गया है?-अवस्तु                                                                                  सत् और असत् से परे अनिर्वचनीय  माना गया है?-अज्ञान                                                                                      अज्ञान की कितनी शक्तियां है?दो (1)आवरण शक्ति (2)विक्षेप शक्ति                                                                                                                                            असर्पभूतायां रज्जौ सर्पारोपवद्वस्तुन्यवस्त्वारोप: यह परिभाषा है-अध्यारोप की                                                                                                                                             जीव और ब्रह्म की एकता रूपी प्रमेय के विषय में अज्ञान के निवृति और आनंद की प्राप्ति कौनसा अनुबंध है?-प्रयोजन                                                                                               " जीव और ब्रह्म की एकता " का प्रतिपादन वेदान्तसार में किस अनुबंध के अन्तर्गत माना जाता है?--विषय अनुबन्घ                                                                                                             जीव और ब्रह्म की एकता तथा उसके प्रतिपादक वेदांत प्रमाण के मध्य संबंध है?-प्रतिपाद और प्रतिपादक का                                                                                                                                                            सतत्त्वतोअन्यथाप्रथा उच्यते?-विकार                                                                                                                अतत्त्वतोअन्यथाप्रथा उच्यते?--विवर्त                                                                                                                वेदांत के अनुसार दस इंद्रियाँ बुद्धि,मनऔर पंच वायु ये सत्रह अवयव सम्मिलित रूप में कहे जाते है?-सूक्ष्म शरीर                                                                                              वेदांत शास्त्र के अनुसार ज्ञानेन्दियाँ उत्पन्न होती है?--आकाश आदि पंचभूतों के सात्विक के अंश से                                                                                                                                                                                                                                                                                                             आकाश के सात्विक अंश से कौन सी ज्ञानेन्द्रिय की उत्पत्ति होती है?--श्रोत्र (कान )                                                                                                                                    वायु के सात्विक अंश कौनसी ज्ञानेंद्रियां उत्पन्न होती है?--त्वक(त्वचा)                                                                                                                                                   तेज के सात्विक अंश से उत्पन्न ज्ञानेन्द्रियाँ है?--चक्षु                                                                                               निश्चयात्मिकाअन्त:करणवृत्तिर्नाम-- बुद्धि                                                                                                     संकल्पविकल्पात्मिका अन्त:करणवृत्तिर्नाम--मन                                                                                            ज्ञानेन्द्रियो सहित बुद्धि कहलाती है?--विज्ञानमयकोश                                                                                   ज्ञानेन्द्रियो सहित मन कहलाता है?--मनोमयकोश                                                                                           कर्मेंद्रियों की उत्पत्ति किस से होती है ?---आकाश आदि पंचभूतों के रजोगुण केअंश से पृथक पृथक                                                                                                                                                                                     जल के रजोगुण से उत्पन्न होता है?---पायु                                                                                                           पृथ्वी के रजोगुण से उत्पन्न कर्मेन्द्रिय है?--उपस्थ                                                                                                  प्राण,अपान,व्यान,उदान,समान हा?--वायु                                                                                                            सूक्ष्म शरीर कितने कोषो से मिलकर बना है?--तीन कोषो(विज्ञानमयकोष,मनोमयकोष,प्राणमयकोष)                                                                                                 Read more  अनुबन्ध चतुष्ट्य,अज्ञान की शक्तियाँ                                                                

सोमवार, 11 फ़रवरी 2019

वेदान्तसार- अनुबन्घ चतुष्टय,अज्ञान की शक्तियाँ

वेदान्तसार (Vedantsaar) महत्त्वपूर्ण तथ्य(important facts)                                                                                                                                               अनुबन्ध चतुष्टय क्या है?-"अनुबन्यते अनेनेति अनुबन्ध: "  किसी ग्रंथ के अनिवार्य अंग या शर्ते अनुबन्ध कहलाती है।         येअनुबंध चार है1 अधिकारी2 संबंध 3 विषय 4. प्रयोजन          अधिकारी-  वेदांतशास्त्र ग्रंथ को पढ़ने का अधिकारी साधन चतुष्टय सम्पन्न व्यक्ति ही हो सकता है।                                           
वेदान्तसार --अनुबन्ध चतुष्ट्य क्या है
वेदान्तसार 
                                                             साधन चतुष्टय क्या है? ---- विवेक, वैराग्य, शमदम आदि षट् सम्पत्तियो से युक्त, मोक्ष का इच्छुक ये चारो साधन साधन चतुष्टय कहलाते हैअर्थात इन गुणों से संपन्न व्यक्ति ही वेदान्तदर्शन को जानने का अधिकारी है ।                                                                                                     सम्बन्ध  -   शुद्ध चैतन्य ब्रह्म इस दर्शन का मूल प्रतिपाद्य (विषय) है और वेदान्त उसका प्रतिपादक प्रमाण है अतः दोनों के बीच प्रतिपाद्य- प्रतिपादक का का संबंध है                                                                                                                                                                                              विषय  * वेदांत शास्त्र का विषय जीवन और ब्रह्म की एकता है                                                                                    प्रयोजन - वेदांत शास्त्र का प्रयोजन ब्रह्म और जीव की एकता  के सम्बन्ध में अज्ञान की निवृत्ति, अपने वास्तविक स्वरूप  "आनंद" की प्राप्ति है।                                                                                                                                        अज्ञान क्या है?- माया,अविद्या, अज्ञान अध्यास,विवर्त आदि शब्दो का प्रयोग वेदान्त में पर्यायवाची  के रूप में हुआ है।वेदांत वेदांतदर्शन में ब्रह्म को ही जगत की उत्पत्ति ,स्थिति और प्रलय का कारण माना गया है। जन्म के अतिरिक्त इस संसार में कुछ भी नहीं है "सर्व खल्विदं ब्रह्म,नेह नानास्ति किञ्चन " अर्थात इस जगत में ब्रह्म के अतिरिक्त किसी की भी वास्तविक सत्ता नहीं है जीव और जगत दोनों माया  अर्थात अज्ञान के कारण हमें  वास्तविक प्रतीत होते हैं जिस प्रकार रज्जु को(रस्सी)अज्ञानवश हम सर्प  समझ लेते हैं  लेकिन जब हमें दीपक के प्रकाश से   "यह तो रज्जु(रस्सी)है सर्प नहीं है"इस प्रकार का बोध होता है। उसी प्रकार  अविद्या, माया के कारण जीव जगत को सत्य समझने लगता हैषलेकिन जब यह माया रूपी पर्दा हमारी आँखो से हट जाता है तो मनुष्य को आत्म स्वरूप का ज्ञान होता है।                                                                                                                   माया या अज्ञान की शक्तियाँ 1आवरण शक्ति  2विक्षेप शक्ति अज्ञान की आवरणशक्ति हमारे ज्ञान को ढक लेती है विक्षेप शक्ति के कारण हमें वास्तविक वस्तु के स्थान पर अवास्तविक वस्तु की प्रतीति होती है।                                                                                                                               धन्यवाद                                                    

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019

samkhyakarika - important questions

h2>  "  सांख्यकारिका के महत्त्वपूर्ण प्रश्न--  सांख्यदर्शन एक महत्त्वपूर्ण टॉपिक है। जिसका अध्ययन संस्कृत के विद्यार्थियों के लिए बहुत ही आवश्यक है। सांख्यकारिका  सांख्यदर्शन का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। जिसमें सांख्य दर्शन के महत्वपूर्ण पच्चीस तत्वो का विभाजन ईश्वरकृष्ण ने चार पदार्थो  प्रकृति ,प्रकृति और विकृति , विकृति , न प्रकृति न विकृति  में किया है। सांख्यकारिका में प्रमाण ,सत्कार्यवाद ,प्रकृति और  पुरुष के स्वरूप, प्रकृति- पुरुष के संयोग से सृष्टि की उत्पत्ति और विनाश , अपवर्ग/कैवल्य/मोक्ष आदि पर विचार किया गया है।   पिछली Postsमें हमने सांख्यकारिका (सांख्यदर्शन) से  संबंधित विषयों के बारे में जाना है।                                              सांख्यदर्शन के 25 तत्त्व                                                 प्रकृति के अस्तित्व सिद्धि हेतु तर्क (सांख्यदर्शन)           सांख्य दर्शन से संबंधित सभी पोस्टें आप इस ब्लॉग के अंदर दर्शनशास्त्र Level पर Click  कर पढ़ सकते है।                                              Important Question's  from samkhyakarika(samkhyadarshan)                                                  सांख्यदर्शन  के  उपदेष्टा कौन हैं?- कपिलमुनि                                                                                                      "सांख्यसप्तति" यह किस ग्रंथ का नाम है?-सांख्यकारिका                                                                                       सांख्यकारिकी में कितनी कारिका है?-70                                                                                                          सांख्य दर्शन में अविकृति है?- मूलप्रकृति                                                                                                             अव्यक्त और अप्रधान नाम है? - प्रकृति के                                                                                                          कितने पदार्थ प्रकृति और विकृति दोनो माने जाते है?-महत्, अहंकार , पञ्च तन्मात्राए कुल 7 पदार्थ                                                                                                                विकृतियाँ कितनी है?- सोलह (एकादश इन्द्रिय, पंच महाभूत)                                                                                                                                                      सांख्य दर्शन के अनुसार पुरुष है?- न प्रकृति न विकृति                                                                                           प्रमेय की सिद्धि किस से होती है?--प्रमाण से                                                                                                          सांख्य दर्शन ने कितने प्रमाण स्वीकार किए हैं ?- 3 प्रमाण                                                                                       "प्रतिविषयाध्यवसाय" किस प्रमाण का लक्षण है? -प्रत्यक्ष प्रमाण                                                                                                                                                                                                                            अनुमान सामान्य का लक्षण है?---लिंगलिंगी पूर्वकम्                                                                                              सांख्य दर्शन के अनुसार प्रत्यक्ष प्रमाण के प्रकार हैं?- 2   1.निर्विकल्पक 2सविकल्पक                                                                                                                                                       सांख्य दर्शन के अनुसार अनुमान कितने प्रकार के है?--3                                                                                        सांख्य दर्शन के अनुसार प्रकृति की  कितनी अवस्थाए है?--2 अवस्थाए 1.साम्यावस्था 2. वैषम्यावस्था                                                                                                           प्रकृति की अनुपलब्धि किस से होती है?--सूक्ष्मता से                                                                                              बुद्धि की प्रकृति क्या है?-मूल प्रकृति                                                                                                                   बुद्धि की विकृति क्या है?- महत्(अहंकार)                                                                                                          एकादश इन्द्रिय किससे उत्पन्न होती है?--अहंकार (महत) से                                                                                   पंचमहाभूत किससे उत्पन्न होते है?--पञ्च तन्मात्राओ  (शब्द,स्पर्श ,रूप,रस,गंध) से                                                                                                                             रूप तन्मात्रा से किस महाभूत की  उत्पत्ति होती है? -अग्नि                                                                                                         शब्द से किस महाभूत की उत्पत्ति होती है?--आकाश                                                                                           पृथ्वी तत्व की प्रकृति (कारण)क्या है?--गंध                                                                                                          सत्कार्यवाद की सिद्धि के कितने कारण है ?--5                                                                                                   सांख्य दर्शन  प्रकृति की व्याख्या कितने गुणों के माध्यम से करता है ? तीन गुण( सत्व गुण,रजोगुण,तमोगुण)                                                                                                अहंकार  कितने प्रकार का होता है? 3प्रकार सात्विक,राजसिक,तामसिक                                                                                                                                                                                                      सत्कार्यवाद के अनुसार उत्पत्ति से पूर्व कारण किस रूप में होता है?--अव्यक्त रूप में                                                                                                                                 सांख्य दर्शन में प्रकृति के अस्तित्व की सिद्धि के कितने तर्क है ?-5तर्क                                                                                                                                                                                                                                      सात्विक अहंकार से उत्पत्ति होती है ?-  एकादश इन्द्रियो की                                                                                    प्रत्ययसर्ग मूल रूप से कितने प्रकार के है ?-4प्रकार विपर्यय,अशक्ति,तुष्टि,सिद्धि                                                                                                                              प्रकृति और पुरुष का संयोग सांख्य दर्शन के अनुसार किस प्रकार का है?-पंगु और अंधे व्यक्ति के समान (पड़्न्गु अन्धवत्)                                                                                     प्रत्ययसर्ग के कुल कितने भेद होते हैं?-पचास                                                                                                       विपर्यय के भेद होते है।- 5                                                                                                                              अशक्ति के भेद होते हैं?-28                                                                                                                             तुष्टि और सिद्धि के क्रमश कितने भेद है? तुष्टि के 9,  सिद्धि के 8                                                                                                                                                          सांख्य में बन्धन का कारण है?- विपर्यय                                                                                             सांख्य में अपवर्ग की प्राप्ति होती है ?-ज्ञान से                                                              

बुधवार, 16 जनवरी 2019

सांख्यदर्शन में मोक्ष, जीवन्मुक्त और विदेहमुक्त क्या है

सांख्य के अनुसार कैवल्य/अपवर्ग या मोक्ष             सांसारिक जीवन केआध्यात्मिक,आधिभौतिक,आधिदैविक त्रिविध दु:खो की आत्यान्तिक निवृत्ति ही मोक्ष,अपवर्ग,कैवल्य है।                                                                                                              मोक्ष में पुरुष अपने नित्य शुद्ध चैतन्य स्वरूप में प्रकाशित रहता है। पुरुष त्रिगुणातीत,बन्धन रहित और परिणामातीत है बन्धन इस जीव का होता है शुद्ध पुरुष का नही ।पुरुष को अपने स्वरूप का ज्ञान स्वयं को अचेतन प्रकृति से भिन्न मान लेने पर होता है यह विवेक ज्ञान ही सांख्यदर्शन में मोक्ष /अपवर्ग या कैवल्य है।                                                                                                                   पुरुष को जब इस प्रकार का ज्ञान होता है कि मै यह नही हूँ मैं अचेतन विषय या ज्ञेय नही हूँ,मै जड़ प्रकृति नही हूँ यह मेरा नही है यह सब मेरा नही है मेरा कुछ नही है मै ममकार से रहित हूँ मै अहंकार भी नही हूँ और जब यह ज्ञान तत्वाभ्यास से सुदृढ़ हो जाता है और जानने के लिए कुछ शेष नही रहता है तब इसे ही विशुद्ध ज्ञान कहते है।                                                                                                                         यह भाव निम्न कारिका में प्रस्तुत किया गया है                                                                              एवं तत्त्वाभ्यासान् नास्मि न मे ना असमित्यपरिशेषम् ।                                           अविपर्ययाद् विशुद्धं केवलमुत्पत्पद्यते ज्ञानम् ।                                                                                                                                      उक्त विवरणानुसार विशुद्ध चैतन्य, पुरुष का स्वरूप है जब जीव को अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो जाता है तो वह ही मोक्ष कहलाता है                                                                                                                         सांख्यदर्शन में मोक्ष या मुक्ति के प्रकार                   सांख्य दर्शन ने मोक्ष मुक्ति के दो प्रकार माने है जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति                                          जीवन मुक्ति- इस प्रकार की मुक्ति सम्यक ज्ञान प्राप्त होने पर होती है इसमें जीव देह से मुक्त नही होता है लेकिन देह के रहने पर भी देह से संबंध नहीं रहता है कर्मो का कोई बंधन नहीं होता, जीव अपने प्रारब्ध कर्मों का भोग केवल शरीर से करता है लेकिन उसमें लिप्त नहीं होता है                                                                                                विदेह मुक्ति जब जीव अपने प्रारब्ध कर्मो का भोग   पूर्ण  कर लेता है तो शरीर भी नष्ट हो जाता है यही मुक्ति विदेह मुक्ति कहलाती है।                                                                                           सांख्य दर्शन में जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति को एक सुन्दर उदाहरण द्वारा समझाया गया है                                         जैसे कुम्हार का चाक , कुम्हार के हाथ हटा लेने पर भी पूर्व वेगके कारण थोड़ी देर घूमता रहता है और फिर वेग समाप्त हो जाने पर स्वत ही बंद हो जाता है।उसी प्रकार जीवन मुक्त का शरीर अपने प्रारब्ध कर्म के अनुसार चलता रहता है और उनके समाप्त होने पर उसका शरीर भी नष्ट हो जाता है।                                                                           सांख्यदर्शन में माना गया है कि अन्त:करण अवच्छिन्न जीव का  लिंगशरीर के रूप में बन्धन होता है और उसी का मोक्ष होता है।                                                                                                  सांख्यदर्शन के अनुसार प्रकृति ही बंधती है और प्रकृति ही मुक्त होती है                                                                       ईश्वरकृष्ण ने सांख्यकारिका में लिखा है-                                                                                                           तस्मान् न बध्यते न मुच्यते नापि संसरति कश्चित ।   संसरति बध्यते मुच्यते न नानाश्रया प्रकृति: ।।                                                                                     प्रकृति को एक नर्तकी के समान प्रस्तुत करते हुए कहा गया है कि वह पुरुष के समक्ष रंगमंच पर अपना प्रदर्शन करके नर्तकी के समान चली जाती है जब पुरुष प्रकृति के स्वरूप को देख लेता है तब विवेकज्ञान द्वारा मुक्त हो जाता है। प्रकृति भी पुरुष को भोग तथा अपवर्ग(मोक्ष) रूपी प्रयोजन सिद्ध करके निवृत्त हो जाती है। जैसा कि निम्नलिखित कारिका में संकलित है                                                                                               रंगस्य दर्शयित्वा निवर्तते नर्तकी यथा नृत्यात् ।       पुरुषस्य तथा आत्मनं प्रकाश्य विनिवर्तते प्रकृति:।।