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सांख्यदर्शन में मोक्ष, जीवन्मुक्त और विदेहमुक्त क्या है

सांख्य के अनुसार कैवल्य/अपवर्ग या मोक्ष             सांसारिक जीवन केआध्यात्मिक,आधिभौतिक,आधिदैविक त्रिविध दु:खो की आत्यान्तिक निवृत्ति ही मोक्ष,अपवर्ग,कैवल्य है।                                                                                                              मोक्ष में पुरुष अपने नित्य शुद्ध चैतन्य स्वरूप में प्रकाशित रहता है। पुरुष त्रिगुणातीत,बन्धन रहित और परिणामातीत है बन्धन इस जीव का होता है शुद्ध पुरुष का नही ।पुरुष को अपने स्वरूप का ज्ञान स्वयं को अचेतन प्रकृति से भिन्न मान लेने पर होता है यह विवेक ज्ञान ही सांख्यदर्शन में मोक्ष /अपवर्ग या कैवल्य है।                                                                                                                   पुरुष को जब इस प्रकार का ज्ञान होता है कि मै यह नही हूँ मैं अचेतन विषय या ज्ञेय नही हूँ,मै जड़ प्रकृति नही हूँ यह मेरा नही है यह सब मेरा नही है मेरा कुछ नही है मै ममकार से रहित हूँ मै अहंकार भी नही हूँ और जब यह ज्ञान तत्वाभ्यास से सुदृढ़ हो जाता है और जानने के लिए कुछ शेष नही रहता है तब इसे ही विशुद्ध ज्ञान कहते है।                                                                                                                         यह भाव निम्न कारिका में प्रस्तुत किया गया है                                                                              एवं तत्त्वाभ्यासान् नास्मि न मे ना असमित्यपरिशेषम् ।                                           अविपर्ययाद् विशुद्धं केवलमुत्पत्पद्यते ज्ञानम् ।                                                                                                                                      उक्त विवरणानुसार विशुद्ध चैतन्य, पुरुष का स्वरूप है जब जीव को अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो जाता है तो वह ही मोक्ष कहलाता है                                                                                                                         सांख्यदर्शन में मोक्ष या मुक्ति के प्रकार                   सांख्य दर्शन ने मोक्ष मुक्ति के दो प्रकार माने है जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति                                          जीवन मुक्ति- इस प्रकार की मुक्ति सम्यक ज्ञान प्राप्त होने पर होती है इसमें जीव देह से मुक्त नही होता है लेकिन देह के रहने पर भी देह से संबंध नहीं रहता है कर्मो का कोई बंधन नहीं होता, जीव अपने प्रारब्ध कर्मों का भोग केवल शरीर से करता है लेकिन उसमें लिप्त नहीं होता है                                                                                                विदेह मुक्ति जब जीव अपने प्रारब्ध कर्मो का भोग   पूर्ण  कर लेता है तो शरीर भी नष्ट हो जाता है यही मुक्ति विदेह मुक्ति कहलाती है।                                                                                           सांख्य दर्शन में जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति को एक सुन्दर उदाहरण द्वारा समझाया गया है                                         जैसे कुम्हार का चाक , कुम्हार के हाथ हटा लेने पर भी पूर्व वेगके कारण थोड़ी देर घूमता रहता है और फिर वेग समाप्त हो जाने पर स्वत ही बंद हो जाता है।उसी प्रकार जीवन मुक्त का शरीर अपने प्रारब्ध कर्म के अनुसार चलता रहता है और उनके समाप्त होने पर उसका शरीर भी नष्ट हो जाता है।                                                                           सांख्यदर्शन में माना गया है कि अन्त:करण अवच्छिन्न जीव का  लिंगशरीर के रूप में बन्धन होता है और उसी का मोक्ष होता है।                                                                                                  सांख्यदर्शन के अनुसार प्रकृति ही बंधती है और प्रकृति ही मुक्त होती है                                                                       ईश्वरकृष्ण ने सांख्यकारिका में लिखा है-                                                                                                           तस्मान् न बध्यते न मुच्यते नापि संसरति कश्चित ।   संसरति बध्यते मुच्यते न नानाश्रया प्रकृति: ।।                                                                                     प्रकृति को एक नर्तकी के समान प्रस्तुत करते हुए कहा गया है कि वह पुरुष के समक्ष रंगमंच पर अपना प्रदर्शन करके नर्तकी के समान चली जाती है जब पुरुष प्रकृति के स्वरूप को देख लेता है तब विवेकज्ञान द्वारा मुक्त हो जाता है। प्रकृति भी पुरुष को भोग तथा अपवर्ग(मोक्ष) रूपी प्रयोजन सिद्ध करके निवृत्त हो जाती है। जैसा कि निम्नलिखित कारिका में संकलित है                                                                                               रंगस्य दर्शयित्वा निवर्तते नर्तकी यथा नृत्यात् ।       पुरुषस्य तथा आत्मनं प्रकाश्य विनिवर्तते प्रकृति:।।                                                              

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