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  मूकता की जंजींरें तोड़ जो कुछ समय पूर्व मै  मुखरता की सीढ़ी चढ़ने लगा। बुनने लगा स्वप्न सजीले जो बंद थे ह्रदय के किसी कोने में  इन सपनों की तस्वीर लिए सजाने कोई नया आशियाना  अपनी ही मस्ती में चलता रहा नयी उमंग लिए।  माना कि मेरे सामने मंजिल का हसीन मंजर था  लेकिन सफर में अभी जगह-जगह बहुत बंजर था  चेहर पर थी मुस्कान अमिट लेकिन चुनौतियों का खंजर था                                                      इकतरफा बढ़ने लगा लगाव अपनी ख्वाहिशों का  लेकिन सशक्त हुआ प्रभाव समय की साजिशो का    प्रतिकूलता की रस्साकशी मुझे खींचने लगी अपनी ओर  छूटने लगी मेरी बंद मुट्ठी से मेरे सजीले सपनों की डोर  घर करने लगा डर अब ह्रदय के उस कोने में  जहाँ से निकाली थी मैने सपनों की तस्वीर   लेकर चला था उसे मनचाहे रंगों से भरने  अपनी मूकता को जो मैने अभी मुखर किया था  क्या समय की विमुखता में बँध जायेंगे म...

तर्कसंग्रह के अनुसार कारण और उसके भेद#Tarksangrah- net/set/collage lecturer/first grade exams#rpsc sanskrit exams

तर्क संग्रह के अनुसार कारण और उसके भेद 
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नाट्यशास्त्र के अनुसार नायक के प्रकार

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