खडा हूँ दोराहे पर इसी सोच में
कि कोई तो रास्ता मुझे मंजिल से मिलाता
जो राह मैने चुनी है वह भी अब कुछ धूमिल है।
तो क्या बढ़ता रहूँ इसी ओर या दूसरी राह चला जाऊँ
खडा हूँ दोराहे पर इसी सोच में
कोई तो राही मुझे सही रास्ता दिखाता।
रचनाकार =शोभा सृष्टि✍️
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