समझ नही आ रहा है मुझे क्या हो गया कुछ समय से,,,,
मेरे हुनर को क्या कोई शाप लग गया है जो भावो को शब्दों का जाम़ा पहनाना भूल गई हूँ।
या उस स्थिति में नहीं हूँ___जहाँ भाव कुछ पल ठहरे और मैं
उनका कलम से स्वागत कर रचना का मुकुट पहना सकूँ।
लेकिन माना जाता है जब भावों का प्रवाह तीव्र हो,निरन्तर हो
तब ही कोई रचना बनती है।
फिर क्या समझूँ भावों में उबाल नही रहा और न ही अधिक
अवधि तक उनका प्रभाव?
इसका मतलब मैं पहले की तरह भावनात्मक नही रही
मुझे क्या करना चाहिए__कहाँ जाना चाहिए ?
ताकि कोई अनुभूति मेरे चित में उतर जाएँ, मुझे कुछ
अनसुना सा संगीत की सरगम बन झकझोर दे।
ऐसा नही कि कुछ लिखना है लिखना ही है।
ऐसी जिद्द पकड़ी ली हो मैने
किन्तु कोई भी शौक,जुनून जो आपको सकारात्मक ऊर्जा
प्रदान करे उससे ज्यादा दिन दूर भी तो नही रहा जाता
जो बात आप के व्यक्तित्व को सँवारती है आपको आनन्दित कर आपके जीवन में अमृत सा भरती हो,
उसे खोना कौन चाहेगा?
इसलिए मैं भी संभाल कर रखना चाहती हूँ मुझे पहचान देने वाले इस अनमोल हुनर को जिसके सृजन से मुझमे एक नवीन सृष्टि ने जन्म लिया।
मैं अपनी मूकता की जंजीरों को तोड़ अभिव्यक्ति के खुले
आसमान में शब्दों के पंख लिए उड़ पाई।
समेट पाई अपने इर्द- गिर्द बिखरे आत्मविश्वास को खड़ी हो पाई अपनी कलम की ताकत के बलबूते पर
पहचान पाई खुद को अपनी नजरों में और अब कोशिश है कि
छोड़ जाऊँगी अपनी छोटी सी काव्यमयी विरासत आने वाले
कल में
कुछ पल के लिए ही सही कुछ लोगो तक ही सही मेरी स्मृति
अंकित हो जाएँगी ह्रदय तल पर
अब जो ये सभी भाव जो शब्दों की श्रृंखला बन उतर रहे
मुझे असीम आनंद की अनुभूति करा रहे है।
मेरी कुछ समय पूर्व की ग्लानि प्रसन्नता में बदलती जा रही है।
डर की दीवार टूटती जा रही है।
मैं कुछ अच्छा लिख पा रही हूँ भाव मेरी कलम से आकर
प्रेमवस लिपट रहे है,,,तैयार है वो अब रचना के बंधन में
बंधने को
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शोभा सृष्टि✍️
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