Shobha Srishti यह" संस्कृत विषय एवं प्रेरणासम्बंधित ब्लॉग है, Motivational and Education Category blog
बुधवार, 31 जुलाई 2019
शनिवार, 20 जुलाई 2019
बुधवार, 10 जुलाई 2019
बेटी हूँ एक बहन हूँ मैं (कविता)
" बेटी हूँ एक बहन हूँ मैं" (कविता)
बेटी के दिल की आवाज इस कविता के माध्यम तक आप सभी तक पहुँचने का छोटा प्रयास मैं कर रही हूँ आज हर बेटी,बहन या कह सकते है हर महिला के दिल की यहीं आवाज है केवल महसूस करने की जरूरत है आज बेटियां अपने जीवन को अपने ढंग से जीने और संवारने का हक चाहती है उनके यही सवाल है कि कब तक लगाम उन पर लगेगी,क्या वे आज चारदीवारी में भी सुरक्षित है क्या आज नैतिक शिक्षा की जरूरत पुरुषो को ज्यादा नही है? सभ्य समाज कब तक असभ्यता का आचरण करेगा? आज शायद इन सभी प्रश्नों का उत्तर कोई देने की हिम्मत भले ही नही कर सकता हो लेकिन उनके प्रश्न बिल्कुल सही है आज उन्होने प्रश्न करने की हिम्मत की है बस हर हिन्दुस्तानी को उनके उत्तर खोजने की हिम्मत करनी है जब उनके उत्तर मिल जाए तब उन पर अमल करने की हिम्मत दिखानी है और तब तक नही रुकना है जब तक हम बेटियो से नजर मिलाकर बात नही कर सके। कविता --- "बेटी हूँ एक बहन हूँ मैं "
>| कविता |
लेकिन इन सबसे पहले एक इंसान हूँ
नही चाहती दर्जा विशेष का,लेकिन रखती हूँ हक समानता का
बेटी हूँ एक बहन हूँ मैं
लेकिन इन सबसे पहले एक इंसानहूँ मैं
नही चाहती तुम मुझे महान समझो बस, अपने जैसा एक जीवित इंसान समझो
बेटी हूँ एक बहन हूँ मैं
लेकिन इन सबसे पहले एक इसांन हूँ मैं
नही चाहिए दया तुम्हारी अब लड़ने की, हमारी बारी
बेटी हूँ एक बहन हूँ मैं
लेकिन इन सबसे पहले एक इंसान हूँ मैं
मर्यादा की अब बात ना करो, मर्यादा को तार-तार करने वालो तुम
अब तक हमने बहुत सुधार किया, कभी खुद की ओर तो झाँको तुम
बेटी हूँ बहन हूँ मैं
अब चारदीवारी तोड़ आसमान में उडने की हकदार हूँ मैं,
सभ्य समाज का खौफ दिखाने वालो, पहले सभ्य समाज की तस्वीर तो बनाओ तुम रिश्तो की बाते करते हो ,थोड़ी आत्मियता तो जगाओ तुम
बेटी हूँ एक बहन हूँ मैं
लेकिन इन सबसे पहले एक इंसान हूँ मैं
ईश्वर की अनमोल कृति हूँ खुद में एक ब्रह्माण्ड हूँ मैं
नही चाहिए झूठा सम्मान तुम्हारा, खुद अपना सम्मान हूँ मैं
उम्मीद करती हूँ आपको यह कविता अच्छी लगी होगी आप सभी अपने दोस्तो को शेयर करे इसी तरह की motivational thoughts कविताएं और लेख संस्कृत जीवा (Sanskrit jeeva) इस ब्लॉग पर आपको पढ़ने को मिलेंगे साथ ही संस्कृत की परीक्षा उपयोगी सामग्री भी यहां उपलब्ध है तो संस्कृत जीवा पर विजिट करना ना भूले।
धन्यवाद
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शुक्रवार, 5 जुलाई 2019
वैदिक साहित्य **अग्नि सूक्त*( 1.1)#net#jrf#set#collage lecturer exam in sanskrit
वैदिक साहित्य **अग्नि सूक्त**
अग्नि सूक्त का परिचय अग्नि सूक्त Rigveda के प्रथम मण्डल का प्रथम सूक्त है जिसके स्तुति कर्ता महर्षि मधुच्छन्दा/विश्वामित्र है। यह सूक्त इन्द्र सूक्त के पश्चात दूसरा सबसे बडा सूक्त है जिसमें 200सूक्तो में अग्नि देवता की स्तुति की गई है। इसके मंत्रो में गायत्री छन्द का प्रयोग हुआ है
नोट:-गायत्री छंद वैदिक छंद है जिसका केवल वैदिक साहित्य में ही प्रयोग हुआ है ।गायत्री छंद में कुल 24 अक्षर होते है।
अग्नि सूक्त 1.1 में कुल 9 मंत्र है जिनको यहाँ सामान्य रूप में बताया जा रहा है-
प्रथम मंत्र में अग्नि देव को कामनाओ को पूरा करने वाला, यज्ञ का पुरोहित,दान आदि दिव्य गुणो से सम्पन्न, विभिन्न रत्नो अर्थात यज्ञ के फलस्वरूप प्राप्त होने वाले श्रेष्ठ पदार्थो को धारण करने वाला आदि सभी नामो से सम्बोधित कर स्तुति का प्रारम्भ किया गया है।
दूसरे मंत्र में बताया है कि अग्नि देव की प्राचीन भृगु आदि के द्वारा भी स्तुति की जाती थी और अब नवीन विश्वामित्र आदि महर्षियों द्वारा स्तुति की जाती है अत:अग्नि देव सभी कालो में स्तुति योग्य माने गये हैं। &nbs p;
तीसरे मंत्र में अग्नि देवता की स्तुति का सुफल बताया है कि अग्नि देवता की स्तुति से यजमान प्रतिदिन पोषण को प्राप्त होने वाले, दानादि के द्वारा यश के प्राप्त होने वाले,पुत्र आदि वीरो से युक्त धन को प्राप्त करता है।
चतुर्थ मंत्र में कहा गया है कि तुम जिस हिंसा से रहित यज्ञ को सभी दिशाओ में प्राप्त कर रहे हो वह यज्ञ ही सभी देवताओ की संतुष्टि के लिए प्राप्त होता है।
पाँचवे मंत्र में अग्निदेवता को होम को निष्पन्न करनेवाला,अतीत और भविष्य को जानने वाला ,मिथ्या से रहित, विविध प्रकार की कीर्ति से युक्त वालो मे श्रेष्ठ, आदि गुणो से स्तुति करते हुए अन्य देवताओ को इस यज्ञ में लाने की प्रार्थना की गई है।
छठे मंत्रमें अग्नि देव को अपने यजमान के लिए सभी प्रकार की वस्तुओ को प्रदानकरने वाला बताते हुए उसके कल्याणकारी स्वरूप को प्रदर्शित किया है।
सातवे मंत्र में नमस्कार का भाव है।
आठवे मंत्र में अग्नि देवता के अन्य विशेषण है -प्रकाशमान, हिंसा रहित यज्ञो का रक्षक, सत्य कर्मो को पुन:पुन प्रकाशित करने वाले और घर की यज्ञशाला में बढ़ने वाले हे अग्नि देव !नमस्कार करते हुए आपके समीप हम जाते है।
नवे और अंतिम मंत्र में अग्नि देव को पितातुल्य अपनी संतान का सर्वहितैषी बनने की कामना है।
विशेष :- दोस्तों अग्नि सूक्त ऋग्वेद का बहुत ही महत्त्वपूर्ण सूक्त माना जाता है जिसे विभिन्न नामों से संबोधित किया गया है।अग्नि देवता का हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है चाहे वह आध्यात्मिक हो भौतिक ह या धार्मिक
संस्कृत के विद्यार्थियों के लिए परीक्षा की दृष्टि से इसका अध्ययन बहुत ही महत्वपूर्ण है सामान्य रूप मे भी अध्ययन ज्ञानवर्धक है ।
👉 वैदिक साहित्य प्रश्नोत्तरी (संस्कृत साहित्य)
| वैदिक साहित्य--**अग्नि सूक्त** |
नोट:-गायत्री छंद वैदिक छंद है जिसका केवल वैदिक साहित्य में ही प्रयोग हुआ है ।गायत्री छंद में कुल 24 अक्षर होते है।
अग्नि सूक्त 1.1 में कुल 9 मंत्र है जिनको यहाँ सामान्य रूप में बताया जा रहा है-
प्रथम मंत्र में अग्नि देव को कामनाओ को पूरा करने वाला, यज्ञ का पुरोहित,दान आदि दिव्य गुणो से सम्पन्न, विभिन्न रत्नो अर्थात यज्ञ के फलस्वरूप प्राप्त होने वाले श्रेष्ठ पदार्थो को धारण करने वाला आदि सभी नामो से सम्बोधित कर स्तुति का प्रारम्भ किया गया है।
दूसरे मंत्र में बताया है कि अग्नि देव की प्राचीन भृगु आदि के द्वारा भी स्तुति की जाती थी और अब नवीन विश्वामित्र आदि महर्षियों द्वारा स्तुति की जाती है अत:अग्नि देव सभी कालो में स्तुति योग्य माने गये हैं। &nbs p;
तीसरे मंत्र में अग्नि देवता की स्तुति का सुफल बताया है कि अग्नि देवता की स्तुति से यजमान प्रतिदिन पोषण को प्राप्त होने वाले, दानादि के द्वारा यश के प्राप्त होने वाले,पुत्र आदि वीरो से युक्त धन को प्राप्त करता है।
चतुर्थ मंत्र में कहा गया है कि तुम जिस हिंसा से रहित यज्ञ को सभी दिशाओ में प्राप्त कर रहे हो वह यज्ञ ही सभी देवताओ की संतुष्टि के लिए प्राप्त होता है।
पाँचवे मंत्र में अग्निदेवता को होम को निष्पन्न करनेवाला,अतीत और भविष्य को जानने वाला ,मिथ्या से रहित, विविध प्रकार की कीर्ति से युक्त वालो मे श्रेष्ठ, आदि गुणो से स्तुति करते हुए अन्य देवताओ को इस यज्ञ में लाने की प्रार्थना की गई है।
छठे मंत्रमें अग्नि देव को अपने यजमान के लिए सभी प्रकार की वस्तुओ को प्रदानकरने वाला बताते हुए उसके कल्याणकारी स्वरूप को प्रदर्शित किया है।
सातवे मंत्र में नमस्कार का भाव है।
आठवे मंत्र में अग्नि देवता के अन्य विशेषण है -प्रकाशमान, हिंसा रहित यज्ञो का रक्षक, सत्य कर्मो को पुन:पुन प्रकाशित करने वाले और घर की यज्ञशाला में बढ़ने वाले हे अग्नि देव !नमस्कार करते हुए आपके समीप हम जाते है।
नवे और अंतिम मंत्र में अग्नि देव को पितातुल्य अपनी संतान का सर्वहितैषी बनने की कामना है।
विशेष :- दोस्तों अग्नि सूक्त ऋग्वेद का बहुत ही महत्त्वपूर्ण सूक्त माना जाता है जिसे विभिन्न नामों से संबोधित किया गया है।अग्नि देवता का हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है चाहे वह आध्यात्मिक हो भौतिक ह या धार्मिक
संस्कृत के विद्यार्थियों के लिए परीक्षा की दृष्टि से इसका अध्ययन बहुत ही महत्वपूर्ण है सामान्य रूप मे भी अध्ययन ज्ञानवर्धक है ।
👉 वैदिक साहित्य प्रश्नोत्तरी (संस्कृत साहित्य)
बुधवार, 26 जून 2019
वेद और वैदिक साहित्य #संहिता,ब्राह्मण,आरण्यक,उपनिषद#वैदिक साहित्य के महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर #vedic sahitya in sanskrit
नमस्कार दोस्तो,
एकबार पुन:आप सभी का स्वागत है जैसा कि आप सभी जानते है वेद और वैदिक साहित्य हमारे संस्कृत विषय में बहुत महत्त्व रखता है क्योकि सर्वप्रथम वेदो की रचनाएँ हुई। उसी के पश्चात लौकिक साहित्य की रचना आरम्भ हुई। वेदो के रचनाकाल के विषय में मत्यैक नही पाया जाता है क्योकि वेदो के रचनाकाल को ठीक प्रकार से निर्धारित करना मनुष्य के लिए पूर्णतया संभव नही है।वेदो के रचनाकाल के संबंध में विभिन्न विद्वानो ने मत प्रस्तुत किए है
यहाँ हम वेदो की संहिता,ब्राह्मण,आरण्यक,उपनिषद से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर लेकर आए है आप इनके अध्ययन से वैदिक साहित्य के बारें में महत्त्वपूर्ण तथ्यो को जान पायेंगे इससे पूर्व भी कुछ Post इनके बारें में प्रकाशित कर चुके है जो आपके लिए उपयोगी है। आप वैदिक साहित्य Category पर Click कर के उन्हे पढ़ सकते है। &p; &nb sp;
ऐतरेय ब्राह्मण के रचयिता कौन है?--महीदास ऐतरेय
चरैवेति चरैवेति यह प्रमुख सूक्ति संबंधित है?--ऐतरेय ब्राह्मण से
शतपथब्राह्मण किस वेद से सम्बन्धित है?--शुक्ल यजुर्वेद
शतपथ ब्राह्मण के रचयिता है?--याज्ञवल्क्य
गोपथ ब्राह्मण का पूर्वगोपथ में कितने प्रपाठक है?--5प्रपाठक
केनेषितं पतति मन: यह वाक्य किस उपनिषद में है?--केनोपनिषद
केनोपनिषद में मंत्र है?--34मंत्र
वेदान्त शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग कहाँ है?--मुण्डकोपनिषद में
मुण्डकोपनिषद में अध्याय है?--3 अध्याय 6खण्ड
ओंकार की मार्मिक व्याख्या किस उपनिषद में वर्णित है?--माण्डूक्य उपनिषद
माण्डूक्य उपनिषद का सम्बन्ध है?--अथर्ववेद से
माण्डूक्य उपनिषद में कितने मंत्र है ?--द्वादश (बारह)मंत्र
"इतिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां "वेद यह सूक्ति सम्बन्धित है?--छान्दोग्योपनिषद
छान्दोग्योपनिषद किस वेद का है?--सामवेद
रसो वै रस: यह पंक्ति किस उपनिषद मेॆ है?--तैतिरीयोपनिषद
माता भूमि:पुत्र अहम् पृथिव्या :यह पंक्ति किस वेद में है?--अथर्ववेद में
अथर्ववेद में कितने काण्ड है?--20
सत्यकाम-जाबालि कथा,नारद सनत्कुमार
आख्यान,इन्द्र विरोचन की कथा किस उपनिषद में है?-छान्दोग्योपनिषद
छान्दोग्योपनिषद में अध्याय है?-8
परा और अपरा विद्याओ का वर्णन किस उपनिषद में है?--मुण्डकोपनिषद
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वेद औरवैदिक साहित्य -संहिता,ब्राह्मण,आरण्यक,उपनिषद
मंगलवार, 25 जून 2019
वेद और वैदिक साहित्य- संहिता,ब्राह्मण,आरण्यक,उपनिषद
संस्कृत वैदिक साहित्य Important questions वेदत्रयी में किसकी गणना नही होती है?-- अथर्ववेद की अथर्ववेद की शाखाएँ कितनी है?-9 अथर्ववेद के देवता?--सोम वैशम्पायन महर्षि किस वेद से सम्बन्धित है? --यजुर्वेद महर्षि पतंजलि के अनुसार यजुर्वेद की कितनी शाखाएँ है?--शतम् अर्थात् सौ महर्षि पतंजलि Rigveda की कितनी शाखाएँ मानते है?--एकविंशति अर्थात् इक्कीस "सविता/सूर्य" देवता का सम्बन्ध किस वेद से है?--सामवेद से यजुर्वेद का विभाजन कितने भागों में हुआ है?--2 1.शुक्ल यजुर्वद 2.कृष्ण यजुर्वेद शुक्ल यजुर्वेद की कितनी शाखाएँ प्रचलित है?-- 2 शाखाएँ 1.वाजसनेयी (माध्यन्दिन ) शाखा 2.काण्व शाखा सामान्यत सामवेद की कितनी शाखाएँ है?--कुल तीन 1कौथुमीय 2.राणायनीय 3जैमिनीय महर्षि पतंजलि ने सामवेद की कितनी शाखाएँ बताई है?-एक सहस्त्र अर्थात् एक हजार देवदर्श,चारणवैद्य शाखाएँ किस वेद की है?--अथर्ववेद गोपथ ब्राह्मण का सम्बन्ध किस वेद से है?--अथर्ववेद गोपथ ब्राह्मण मे कुल कितने अध्याय है?--11 शुक्ल यजुर्वेद का ब्राह्मण है?--शतपथ ब्राह्मण कृष्ण यजुर्वेद की कितनी शाखाएँ है?--4 किस वेद का कोई भी आरण्यक नही है?--अथर्ववेद का Rigveda के ब्राह्मण कितने है?-- 2 1ऐतरेय ब्राह्मण 2कौषीतकि ब्राह्मण सबसे प्राचीन आरण्यक कौनसा है?* शतपथ ब्राह्मण ईश,मुण्डक उपनिषद का सम्बन्ध किस वेद से है?--अथर्ववेद बाष्कल उपनिषद का सम्बन्ध किस वेद से है?--Rigveda आंगिरसवेद,अथर्वांगिरसवेद,ब्रह्मवेद,क्षत्रवेद,महीवेद, भैषज्यवेद किस वेद को कहते है?--अथर्ववेद को पूर्वाचिक और उत्तरार्चिक रूप में किस वेद का दो प्रकार से विभाजन है?-सामवेद का पूर्वाचिक में 650 मंत्र,उत्तरार्चिक में 1225 मंत्र है सुमन्तु महर्षि का सम्बन्ध किस वेद से है?--अथर्ववेद से
रविवार, 16 जून 2019
Exam preparation --net/jrf2019(sanskrit)
Exam preparation --net/jrf2019(sanskrit) संस्कृत में पूछे जायेंगे ये प्रश्न : वे सभी परीक्षार्थी जो June 2019 में आयोजित Net/jrf परीक्षा की तैयारी कर रहे है उन्हे Best of luck आप सभी इस परीक्षा में उत्तीर्ण हो और आप का भविष्य अच्छा बने। Sanskrit jeeva मेरे इस ब्लाँग के माध्यम से मैने कुछ प्रयास संस्कृत विषय के विद्यार्थियो के लिए किए ताकि मैं आप सभी की कुछ मदद कर सकूँ और अपने गुरुजनो से प्राप्त ज्ञान को सार्थक कर सकूँ । क्योकि मैं सीखने और सिखाने को ही सफलता का मूल मंत्र मानती हूँ कोई भी अपने आप में पूर्ण नही होता है ।यह यात्रा जीवन भर चलती है। Practice ही आत्मविश्वास भरती है।आत्मविश्वास की ही जीत होती है। आप सभी अपनी मेहनत और योग्यता पर विश्वास कीजिए ।आपने जितनी भी तैयारी की है उस तैयारी को अभ्यास के लिए दिए जाने वाले प्रश्नो को हल कर जाँचिए । क्योकि अभ्यास कार्य के दौरान बहुत से ऐसे प्रश्न जिनके बारे में हम 100% काँन्फिडेंट नही होते है उनका सही उत्तर हमारे Mind में बैठ जाता है ,दूसरे बहुत से नये प्रश्न हमारे सामने आते है जो परीक्षा में पूछे जा सकते है। हमारी पेपर साँल्व करने की स्पीड क्या है वह हमें मालूम होती है,उसमें सुधार करने से परीक्षा में समय पर पेपर पूरा कर पायेंगे क्योकि परीक्षार्थियो के लिए समयप्रबन्ध भी अनिवार्य तत्त्व है। इन सभी बातो को ध्यान में रखकर आप अपने लक्ष्य में सफलता अवश्य प्राप्त करेंगे। अभी जितना भी समय आपके पास है उसका सदुपयोग करें किसी भी प्रकार के तनाव से दूर रहे परीक्षा के नजदीकी दिनो में अपने मनोबल को बनाये रखना भी परीक्षा की तैयारी का महत्त्वपूर्ण अंग है ।शान्तचित से कार्य करें ,मस्त रहें। योगा, एक्सरसाइज करे जिससे आप अपनी तैयारी पर अच्छी तरह Focus कर पायेंगे इनसे Memory power increase होता है, जिससे आप Smart work कर पाते है। अपनी मेहनत पर भरोसा रखिए सफलताएँ आपकी झोली में होगी । Important articles *** दशरूपकम् के अनुसार नाटक की पाँच अवस्थाएँNet/jrf/M.A.syllabus के अनुसार संस्कृत साहित्य के महत्त्वपूर्ण प्रश्न first grade/second grade/net-jrf के लिए काव्य के गुण (आचार्य मम्मट के अनुसार) महाभारत का स्वरूप :साहित्य जगतको देन
table align="center" cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="margin-left: auto; margin-right: auto; text-align: center;">शनिवार, 8 जून 2019
दशरूपकम् के अनुसार नाटक की पाँच अवस्थाएँ# net/jrf/M.A. syllbus के अनुसार
दशरूपकम् के अनुसार नाटक की पाँच अवस्थाएँ-- दशरूपकम् के प्रथम प्रकाश में धनंजय ने नाटक की पाँच अर्थप्रकृति और पाँच अवस्थाएँ बताई है जो किसी भी काव्य में कथावस्तु के सम्यक प्रकार के संयोजन के लिए अनिवार्य है पिछली पोस्ट में हमने पाँच अर्थप्रकृतियो के बारे में जाना। इस पोस्ट में हम नाट्यशास्त्रीय पाँच अवस्थाओं के बारे में जानेंगे। इन पंच अर्थप्रकृति और पंच अवस्थाओ के संयोजन से नाट्यशास्त्र की पंच सन्धियों का निर्माण होता है। जो कथावस्तु के विभाजन को सरल और सम्यक बनाती है।
नाट्यशास्त्र की पंच अवस्थाएँ ---- अवस्था पञ्चकार्यस्य प्रारब्घस्य फलार्थिभि: ।
आरंभ यत्नप्राप्त्याशानियताप्ति फलागमा:।। उपरोक्त श्लोकानुसार फल या प्रयोजन सिद्धि के लिए प्रारंभ किए गए कार्य कीआरम्भ,यत्न,प्राप्त्याशा,नियताप्ति,फलागम ये पाँच अवस्थाएँ होती है।
आइये हम इनके बारें मे जान लेते है--- आरम्भ --"औत्सुक्यमात्रमारम्भ:फल लाभाय भूयसे" ।
अभीष्ट फल प्राप्ति के लिए उत्सुकता की उत्पत्ति होना ही आरंभ कहा गया है। उदाहरण के रूप में रत्नावली नाटिका के प्रारम्भ में उदयन का मंत्री यौगन्धरायण कहते है कि मैं अपने प्रयत्नो और दैव के सहयोग से अपने स्वामी के लिए किए
जाने रहे कार्य में अवश्य सफलता प्राप्त करूँगा उनका इस प्रकार का दृढ.निश्चय करना ही आरम्भ है।
प्रयत्न--
"प्रयत्नस्तु तद्प्राप्तौव्यापारोअतित्वरान्वित"
फलप्राप्ति के लिए निरन्तर अनेक साधनो और उपायो के द्वारा कार्य में लगे रहना ही प्रयत्न कहलाता है। जैसे रत्नावली नाटिका में सागरिका उदयन से मिलना चाहती है लेकिन मिलन का उपाय नही निकलने पर वह उदयन का चित्र बनाने लगती है ।इस प्रकार का प्रयास ही प्रयत्न कहलाता है।
प्राप्त्याशा--"उपायापायाभ्यां प्राप्त्याशा प्राप्तिसंभव:।"
उपाय के होने पर भी बिघ्न की आशंकाओं से जब फल प्राप्ति में निश्चित्ता नही होती है तो वह अवस्था "प्राप्त्याशा" कहलाती है।जैसे रत्नावली नाटिका में उदयन द्वारा वेश परिवर्तन कर रत्नावली से मिलन के उपाय सोचने पर भी विदूषक कहता है कि कही वासवदत्ता द्वारा इस कार्य में बाधा उपस्थित नही कर दी जाएँ। इस प्रकार कार्य की सिद्धि में विघ्नोकी आशंका होना ही "प्राप्त्याशा" नामक अवस्था कहलाती है। नियताप्ति--"अपायाभावत:प्राप्तिर्नियताप्ति:सुनिश्चिता "
विघ्नो के समाप्त होने पर जब फल प्राप्ति के सम्बन्ध में कोई आशंका नही रहे अर्थात् प्राप्ति निश्चित हो जाए, वह अवस्था नियताप्ति कहलाती है।उदाहरण के रूप में जब रत्नावली नाटिका में वासवदत्ता रत्नावली को बंदी बना लेती तब विदूषक राजा उदयन से कहता है कि वासवदत्ता की प्रसन्नता ही रत्नावली की प्राप्ति का उपाय है अर्थात् रत्नावली से विवाह करना चाहते है तो आपको अपनी पत्नी वासवदत्ता को प्रसन्न करना चाहिए उसकी अनुमति से ही आपका यह कार्य सिद्ध हो सकता है क्योंकि रानी वासवदत्ता के प्रसन्न होने पर आपके और रत्नावली के मिलन की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी ।
फलागम--"समग्रफलसम्पत्ति:फलयोगो यथोदित:"समग्र फल की प्राप्ति होना ही 'फलागम' नामक अवस्था कहलाती है।प्रत्येक नाटक में धर्म अर्थ काम इन तीनों में से जो भी प्रयोजन नाटक का हो उसकी संपूर्ण रूप में प्राप्ति ही फलागम है। जैसे रत्नावली नाटक के अंत में राजा उदयन को रत्नावली की प्राप्ति और चक्रवर्तित्व की प्राप्ति होती है यही नाटक की फलागम अवस्था है।
उम्मीद है आप सभी के लिए यह पोस्ट ज्ञानवर्धक होगी संस्कृत साहित्य और व्याकरण से जुड़ी जानकारी के लिए आप सभी हमारे Blog पर Visit करे हमारे द्वारा लिखी गई पोस्टे आप की Exam preparation में सहायक होंगी ।
धन्यवाद✍️🙏 यह भी पढे़ दशरूपकम्/नाटक की अर्थप्रकृतियाँ वेदांगो का परिचय
मंगलवार, 4 जून 2019
अर्थप्रकृतियाँ कितनी है? #दशरूपकम् # धनञ्जय
Hello friends welcome strugglealwaysshine.blogspot.com पर एक बार फिर आप से कहना चाहती हूँ अगर आप संस्कृत विषय में रुचि रखते है या आप NET/SET/JRF/COLLAGE LECTURER,SECOND GRAD,FIRST GRADE ki preparation kar rahe to "sanskrit jeeva "इस Blog ko Follow करना मत भूलिए।
आज हम दशरूपककार धनंजय द्वारा अपने नाटक शास्त्रीय ग्रन्थ दशरूपक में बताई "अर्थप्रकृति" के सम्बन्ध में जानेंगे।
धनञ्जय ने अपने ग्रंथ दशरूपकम् में कथावस्तु का
विभाजन पाँच संधियों के आधार पर किया है। उनके
अनुसार अर्थ प्रकृति और अवस्थाओ के संयोग को
संधि कहते है। ये संधियाँ ही कथावस्तु का आधार होती हैं अत:इन संधियो को समझने से पूर्व इस Post में
अर्थप्रकृति के बारें जानेंगे।
अर्थप्रकृति किसे कहते है अर्थप्रकृति में अर्थ का अभिप्राय प्रयोजन अथवा फल है प्रकृति का अर्थ फल या प्रयोजन की सिद्धि में कारण या हेतु है।इस प्रकार हम कह सकते है कि फल या प्रयोजन की प्राप्ति के लिए जो
उपाय है वही अर्थप्रकृति कहे जाते है।
ये क्रमश: बीज, बिन्दु,पताका,प्रकरी,कार्य पाँच होती है।
इन पाँचो में से बीज,बिन्दु,कार्य ये तीन आवश्यक
अर्थप्रकृतियाँ मानी गई है।जबकि पताका ,प्रकरी समस्त रूपकों में अनिवार्य नही है।जिस रूपक मेॆ नायक को
सहायता की आवश्यकता नही होती है वहाँ इन दोनो की अनुपस्थिति होती है। अर्थप्रकृति कितने प्रकार की होती है।
उपरोक्त कारिका के अनुसार धनंजय ने अपने ग्रंथ
| अर्थप्रकृति |
" दशरूपकम्" में पाँच अर्थप्रकृतियाँ बतायी है।
(1)बीज (2)बिन्दु (3)पताका (4)प्रकरी (5)कार्य
बीज---स्वल्पोछिष्टस्तु तद्हेतुर्बीजं विस्तार्यनेकधा: । जो किसी नाटक के आरम्भ में अल्परूप में निर्दिष्ट तत्व है लेकिन प्रयोजन अथवा फल प्राप्ति में मुख्य कारण बनता है ।वह बीज नामक अर्थप्रकृति कहलाती है
यह बीज अनेक प्रकार से विस्तृत रूप धारण करता है जिस प्रकार बीज देखने मे छोटा होता है लेकिन यही समय के साथ अनेक शाखाओ के रूप में विस्तृत रूप से फैलता है और हमें फल प्रदान करता है उसी प्रकार किसी नाटकादि में कोई
कथन या कोई छोटा सा विचार जो नाटक के फल की प्राप्ति का प्रारम्भिक कारण है वह "बीज "नामक अर्थप्रकृति होती है ।उदाहरण के रूप में रत्नावली नाटक में दैव(भाग्य)अनुकूल
होने पर सभी कार्य सिद्ध होते है।यह कथन यौगन्धरायण को अपने स्वामी उदयन के लिए कार्य प्रारम्भ करने की
प्रेरणा देता है।
बिन्दु---अवान्तरार्थविच्छेदेबिन्दुच्छेदकारणम् । किसी अवान्तर कथा के द्वारा जब मुख्य कथा मे
बाधा उत्पन्न होती हैतब मुख्य कथा को फिर जोड़ने
वाला तथा आगे बढा़ने वाला जो उपाय किया जाताहै
वह बिन्दु है यह बिन्दु जल में तेल के समान होता है।
उदाहरण- रत्नावली नाटिका में वासवदत्ता द्वारा कामदेव की पूजा के प्रसंग से मुख्य कथा में विच्छेद होने पर पर उदयन केआगमन की सूचना दीजाती है सागरिका यह सुनकर
कहती है कि यही राजा उदयन है जिनके लिए मेरे पिता
मुझे दे रहे है। उसके ह्रदय में राजा उदयन के प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है।जिससे मुुख्य कथा को गति मिलती है। पताका---सानुबन्धं पताकारव्यम् -
वह प्रासंगिक कथा जो मुख्यकथा के साथ दूर तक
चलती है।वह पताका कहलाती है जैसे रामायण में
सुग्रीव की कथा। पताका के नायक को पताका नायक
कहते है।यह सहनायक होता है जो मुख्य उद्देश्य की प्राप्ति
में नायक की सहायता करता है। प्रकरी--- प्रकरी च प्रदेशभाक् ।
वह प्रासंगिक कथा जो दूर तक नही चलती है
जैसे रामायण में शबरी वृतान्त
कार्य--कार्यत्रिवर्गस्तच्छेदद्वमेकानुबन्धि च। धर्म,अर्थ,काम ये तीनो किसी भी नाटकादि के मुख्य
फल माने गए है इन तीनो में से एक,दो या तीनो फलो की प्राप्ति होना हो कार्य है। उदाहरण रत्नावली नाटिका में
रत्नावली की प्राप्ति।
इस प्रकार धनंजय ने अपने दशरूपकम् के प्रथम प्रकाश में पाँच अर्थ प्रकृतियाँ बतायी है।
👉 यह भी पढ़े ** तर्कसंग्रह
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